Monday, 31 August 2015

Text of Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi’s address at the release of the digital version of Ramcharitmanas : 31 August, 2015


ये कार्यक्रम जहां हो रहा है, उस स्‍थान का नाम है पंचवटी और जब वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, तब इस निवास स्‍थान में पंचवटी का निर्माण हुआ और नाम पंचवटी रखा गया था और शायद मैं मानता हूं आज का अवसर पंचवटी में होना अपने आप उसके कारण उसका एक कीर्तिमान बढ़ जाता है, क्‍योंकि रामचरितमानस की बात हो और पंचवटी न हो, तो फिर वो रामचरितमानस अधूरा लगता है और इसलिए ये अपने आप में एक सुफल संयोग है। 
आज के इस अवसर को मैं अलग-अलग रूप में अनुभव करता हूं। कभी-कभी सरकार में लोग नौकरी करते-करते जीवन ऐसा बन जाता है, एक मशीनी गतिविधि बन जाती है और वही सुबह जाना, शाम को आना, वही फाइलें, वही बॉस, वहीं assistant, एक जिंदगी के बड़े महत्‍वपूर्ण 30-35 साल उसी में गुजर जाते है और ज्‍यादातर का मन बन जाता है कि चलो अब इस पाइपलाइन में घुसे है 30-35 साल के बाद उधर निकलेंगे। जिस रूप में निकलेंगे, निकलेंगे.. लेकिन यह अवसर देख करके ध्‍यान में आता है कि एक सरकार का मुलाजिम, जिसमें एक तड़प हो, कुछ करने की अदम्‍य इच्‍छा हो, वो कितनी बड़ी विरासत छोड़ करके जाता है और इसलिए सबसे पहले मैं आकाशवाणी के उस एक सामान्‍य अधिकारी जिनके परिवारजन.. ये औरों के लिए भी प्रेरक बन सकता है। हमारी जिंदगी व्‍यर्थ नहीं जा रही है। हम जो फाइलों पर साइन करते है वो बेकार नहीं होती, कभी न कभी इतिहास को वो नया मोड़ देते है। ये आज की घटना उस बात का जीता-जागता सबूत है।
दूसरी बात, करीब-करीब 20-22 साल तक लगातार इसका रिकार्डिंग हुआ है। 22 साल तक उस team को बनाए रखना, उस rhythm को बनाए रखना और उसे उतना ही प्राणवान बनाए रखना, वरना तो यार बहुत हो गया अब कितने ऐपिसोड हो गए, अब तो लोगों को आदत हो गई, चलो निकाल दो। नहीं। इससे जुड़े हुए कलाकार शायद आज हिन्‍दुस्‍तान के बड़े कलाकारों की संख्‍या में उनका नाम नहीं होगा, लेकिन संगीत के साधक के रूप में। 22 साल करीब-करीब ये साधना कम नहीं होती जी, 14 लोगों ने team बन करके काम किया, 7 लोग हमारे बीच नहीं रहे, सबको आज सम्‍मानित करने का आज अवसर मिला और ये सिर्फ संगीत नहीं है। ये संगीत की भी साधना है, संस्‍कृति की भी साधना है और संस्‍कार की भी साधना है। और ये काम, देखिए हमारे देश में कई उतार-चढ़ाव है, वैचारिक धरातल पर भी उतार-चढ़ाव आए हैं। आज अगर कोई ओम बोल दे तो हफ्तेभर विवाद चलता है कि ओम कैसे बोला जा सकता है। देश :::: सांम्‍प्रदायिक है। ऐसे देश में रामचरितमानस को किसी ने question नहीं किया, वो आज भी चल रहा है। हो सकता है आज के बाद किसी का ध्‍यान जाए और तूफान खड़ा कर दे, तो मैं नहीं जानता हूं। लेकिन कभी-कभार हम देखते है कि बहुत सालों से सुनते आए है, क्‍या बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं है हमारी। जवाब खोजने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। यही बात है कि जिसके कारण हस्‍ती मिटती नहीं है हमारी, यही तो रामचरितमानस है, यही तो परम्‍परा है, यही संस्‍कार है।
हजारों साल से दुनिया में हमारी जो सबसे बड़ी विशेषता है जिसके लिए विश्‍व के किसी भी समाज को हमारे प्रति ईर्ष्‍या हो सकती है, वो है हमारी परिवार व्‍यवस्‍था और हम बचे हैं बने है उसका एक कारण.. जब तक हमारी परिवार व्‍यवस्‍था प्राणवान रही है, हम ताकतवर रहे है और उस परिवार व्‍यवस्‍था को प्राणवान बनाने में बहुत बड़ी भूमिका अगर किसी ने निभाई है तो रामचरितमानस और राम जी का परिवार जीवन है। मर्यादा पुरूषोत्‍तम राम.. मर्यादाओं में किसने कैसे जीना परिवार में। किसकी कैसे मर्यादा को पालन करना, कैसा व्‍यवहार करना, आचरण का उत्‍तम संस्‍कार का हमें दर्शन होता है। रामचरितमानस की क्‍या ताकत देखिए हजारों साल हो गए, पीढि़यां बीत गई लेकिन वहीं भाव, वही परम्‍परा, वही संस्‍कार, वही संदेश आज भी जीवित है। आज एक बात हम कहें, लिखित कहें लेकिन संदेश पहुंचते-पहुंचते सात दिन में उसका अर्थ अलग ही हो जाता है। ऐसा कौन सा सामर्थ्‍य होगा कि जिसमें आज भी अनेक व्‍याख्‍याएं होने के बाद भी मूल तत्‍व को कहीं पर भी खरोच नहीं आई है। ऐसी कृति मानव को इस धरती के साथ जोड़ने का इतना बड़ा काम है। 

आज भी अगर हम मॉरिशस में जाए दुनिया के कई देशों में, जो लोग गुलामी के कालखंड में मजदूर के रूप में उनको उठा करके ले जाया गया, कुछ नहीं था, निर्धन थे। लेकिन तुलसीकृत रामायण साथ ले जाना नहीं भूले, हनुमान चालीसा ले जाना नहीं भूले और डेढ़ सौ साल अलग जीवन, भाषा भूल गए, पहनावा बदल गया, नाम में बदलाव आया, लेकिन एक अमानत उनके पास बची जिससे आज भी भारत के साथ उनका नाता जुड़ा रहा है और कैसे जुड़ता है मुझे बहुत साल पहले की घटना याद है। वेंस्‍टइंडिज की एक क्रिकेट टीम भारत में खेलने के लिए आई थी। बहुत साल पहले की बात कर रहा हूं और उसके मैनेजर का मेरे यहा फोन आया। अब आज से 30-35, 40 साल पहले मुझे कोई पहचानता नहीं था, न कोई नाम न कोई जान। उनका टेलीफोन आया मुझे आश्‍चर्य हुआ, कि बोले वेंस्‍टइंडिज के क्रिकेटर के मैनेजर आप से बात करना चाहते है, मिलना चाहते है। तो किसी ने नाम दिया होगा, कही परिचय निकला होगा। मैंने कहा वेंस्‍टइंडिज टीम से मेरा तो वैसे भी क्रिकेट के खेल से.. मैं कोई खिलाड़ी तो हूं नहीं, तो पता चला तो बोले रामरिखीनाम है इनका और वो अपनी पत्‍नी के साथ आए है। मूल भारतीय है, तो मैं उनको मिलने गया तो वहां एचआरडी मिनिस्‍ट्री में काम करते थे और टीम मैनेजर के रूप में आए थे। तो मैंने कहा ये ऋषि शब्‍द कहा से आया तो बोले ऋषि में से आया हुआ होगा, फिर उनकी पत्‍नी का नाम पूछा तो बोले सीता। वो भारत पहली बार आए थे। लेकिन उनको अपना और मैं जब गया तो specially वो भारतीय परिवेश पहन करके बैठे थे। यानी एक प्रकार से एक ग्रंथ डेढ़ सौ साल के बाद भी अपनेपन से जोड़ करके रखता है] इसका ये उत्‍तम अनुभव.. और इस अर्थ में रामचरितमानस आज digital form में ये सबके सामने जा रहा है।
आकाशवाणी की ताकत बहुत बड़ी है, कितनी ही चीजें क्‍यों न बदल जाए, लेकिन कुछ मूलभूत चीजें होती है, जो अपनी.. बुलंदी कभी खोती नहीं है। हिन्‍दुस्‍तान के जीवन में आकाशवाणी की ये बहुत बड़ी ताकत है। लोगों को भले एहसास न होता, हो मुझे तो एहसास है। हम लोग भली-भांति समझते है आकाशवाणी की ताकत क्‍या है। ये मेरा एक ऐसा अनुभव है जो मैं कभी भूल नहीं सकता। मैं हिमाचल में भारतीय जनता पार्टी के संगठन का काम करता था। अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। और मैं हिमाचल में काम करता था, तो एक दिन मैं अपने दौरे पर जा रहा था तो ऐसे ही पहाड़ों में एक ढाबे पर रूक करके चाय पीने की सोचा, तो गाड़ी को रोकी। जब मैं नीचे उतरा तो जो ढाबे वाला था, चाय वाला उसने मुझे लड्डू खिलाया। मैंने कहा भई मुझे चाय पीनी है। अरे बोले साहब लड्डू खाओ पहले, मौज करो। मैंने कहा क्‍या बात है। बोले अरे आज अटल जी ने बम फोड़ दिया, मैंने कहा अटल जी ने बम फोड़ दिया। अरे बोले अभी-अभी रोडियो पर सुना है कि भारत ने बम फोड़ा है। न्‍यू‍क्लियर टेस्‍ट हुआ था। मुझे वो पहली खबर आकाशवाणी के माध्‍यम से एक चाय वाले, ढाबे वाले ने दी। 

यानी हम जिन चीजों का कभी-कभी महत्‍व नहीं समझते, वो कितना बड़ा होता है ओर सिर्फ खबर नहीं, सिर्फ खबर नहीं। हिमायल की पहाडि़यों में दूर-सुदूर अकेला चाय के ढाबे वाला, इस समाचार से अपने आपको इतना गौरवान्वित महसूस कर रहा है कि गरीब होने के बावजूद भी अपनी दुकान की मिठाई मुफ्त में बांट रहा है। संदेश की ताकत क्या है, देखिए और समय ज्‍यादा नहीं हुआ होगा, ये 5 बजे declare हुआ होगा शाम को और मैं करीब 6 सवा 6 बजे वहां से गुजर रहा हूं। कहने का तात्‍पर्य ये कि हमारे ये communication अपने आप में इतने बड़े देश में बहुत अनिवार्य है, बहुत आवश्‍यक है और आज के competition के युग में आकाशवाणी को स्‍पर्धा में फंसने की जरूरत नहीं है जी। उसने तो अपनी मूलभूत धाराओं को पकड़ करके जन-जन के दिलों तक जुड़े रहना ओर देश को जोड़ के रखना और भविष्‍य के साथ उनको उत्‍साहित करते रहना ये उसका काम है। और उस काम को हम कैसे निभाएं। 

युग बदलता जाए वैसे बदलाव आवश्‍यक होता है कायाकल्प जरूरी होते है ओर जब कायाकल्प की बात करता हूं तब आत्‍मा वही रहता है, समयाकूल बदलाव आता है। ये डिजिटल रूप उसका एक सही कदम है। हम लोग, अब मुझे बताया गया आकाशवाणी के पास 9 लाख घंटों का recording material उपलब्‍ध है, 9 लाख घंटे। शायद दुनिया में किसी एक ईकाई के पास इतना खजाना नहीं होगा जी और उस समय आकाशवाणी का जो रूप-रंग था बाद में जो हमारे यहां जो चला माहौल, अलग बात है, मैं जरूर मानता हूं कि आ‍काशवाणी के पास भारत की मूल आवाज, भारत का मूल चिंतन, भारत की मूल undiluted ये उसमें उपलब्ध होगा। ये 9 लाख घंटों का जब digital version तैयार होगा फिर उसमें भाषाओं का उपयोग किया जा सकता है कि नहीं कितनी बड़ी सेवा होगी, कितना बड़ा खजाना ओर एक प्रकार से digital history का ये सबसे बड़ा resource material बन सकता है। जो शायद आने वाले दिनों में जो पीएचडी करना चाहते होगे उनके लिए एक बहुत अवसर बनेगा। और भारत का दूरदर्शन का काम तो ऐसा है कि हिन्‍दुस्तान की सभी यूनिवर्सिटी में एकाध-एकाध विद्यार्थी ने सिर्फ आकाशवाणी के योगदान पर पीएचडी करनी चाहिए, रिसर्च करनी चाहिए। हम लोगों के स्‍वभाव नहीं है। एक एकाध प्रेमचंद की कथा पर तो रिसर्च कर लेते है, लेकिन इतना बड़ा खजाना। आगे चल करके Human Resource Department के लोग, Culture Department के लोग सोचें कि हमारे नौजवान इस खजाने का research करके क्‍या दे सकते है दुनिया को। हम आगे के लिए क्‍या सोचे। विश्‍व के लोग भी अंतर्राष्‍ट्रीय योगा दिवस ने सिद्ध कर दिया है कि दुनिया भारत को जानने-समझने के लिए आतुर है, तैयार है। वे अंतर्राष्‍ट्रीय योगा दिवस ने ये message दिया है कि भारत के पास कुछ है जो हमें जानना है, पाना है ये मूढ़ बना है तब हमारा कर्तव्‍य बनता है कि हम इसको कैसे पहुंचाए और ये अगर हम कर सकते है तो हम कितनी बढ़ी सेवा कर सकते है।
इनदिनों आकाशवाणी एक अच्‍छा काम भी किया है.. आकाशवाणी नहीं, रेडियों के कारण धीरे-धीरे जो आज एफएम चैनल वगैरह सब जो दुनिया चलती है। लोग कहते है भ्रष्‍टाचार के लिए क्‍या किया? हमारे यहां FM चैनल सारी पहले सरकारी खजाने में 80 सौ करोड़ रुपया देती थी। अभी आक्‍शन चल रहा है, आक्‍शन से देंगे ट्रांसपैरेंसी, परिणाम क्‍या आया मालूम है अब तक करीब-करीब साढ़े 11 सौ करोड़ की बोली बोल चुके है, अभी तो बोली चल रही है और उसके जो rules and regulations है उसके हिसाब से सरकार के खजाने में जो 80 सौ करोड़ आते थे एक स्थिति आएंगी 27 सौ-28 सौ करोड़ रुपए आएगे। व्‍यवस्‍थाओं को transparent करने से व्‍यवस्‍थाओं को आधुनिक टेक्‍नोलोजी से जोड़ करके भ्रष्‍टाचार से मुक्ति कैसे पाई जा सकती है। कोई नया आर्थिक बोझ डाले बिना भी देश के विकास में धन कैसे उपलब्‍ध किया जो सकता है इसका एक बेहतरीन नमूना.. ये आकाशवाणी और रेडियो के संबंध में जो भारत सरकार ने अरुण जी के नेतृत्‍व में किया है, उसका ये परिणाम है। 

तो हर दिशा में हम इस काम को आगे बढ़ा रहे है और मुझे आशा है कि ये digital version के कारण विश्‍व के लोग जो जानना चाहते है, समझना चाहते है उनके लिए उपकारक होगा। भोपाल केंद्र के लोगों ने गौरवपूर्ण काम किया है; आने वाले दिनों में भोपाल में एक विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन हो रहा है। आकाशवाणी सोचे विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन में जो delegate आने वाले है भोपाल में ही हो रहा है तो ये उनको गिफ्ट के रूप में दिया जाए, ताकि एक souvenir..एक सच्चा souvenir ये बनेगा, जो विश्‍वभर से गरीब, काफी बड़ी तादात में लोग आ रहे है तो एक बहुत बड़ा अवसर बनेगा। 

मैं फिर एक बार विभाग को, प्रसार भारती को, आकाशवाणी को ये बहुमूल्य चीजें संभाले रखने के लिए बधाई देता हूं। और देशवासियों को ये नजराना देते हुए मैं गर्व महसूस करता हूं। मैं आभारी हूं डॉ. कर्ण सिंह जी का और मैंने देखा है कि हमारे कर्ण सिंह जी इन चीजों से ऐसे जुड़े हुए है, इसका इतना महामूल्‍य मानते है वो, कि उनको कोई राजकीय विचारधारा कभी बाधा नहीं बनती है और हमेशा ऐसी चीजों को वो आर्शीवाद देते रहें, प्रोत्‍साहन देते रहें। आज विशेषरूप आए इसलिए मैं उनका आभार व्‍यक्‍त करता हूं। बहुत-बहुत धन्‍यवाद! 
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Sunday, 30 August 2015

Mann ki Baat - 30 August 2015

‘मन की बात’

प्रसारण तिथि : 30.08.2015


मेरे प्यारे देशवासियो, आप सबको नमस्कार I फिर एक बार, मन की बातें करने के लिए, आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला है I सुदूर दक्षिण में लोग ओणम के पर्व में, रंगे हुए हैं और कल पूरे देश ने रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया I भारत सरकार ने, सामाजिक सुरक्षा को लेकर के कई नई-नई योजनायें, सामान्य मानवों के लिए लागू की हैंI मुझे ख़ुशी है कि बहुत कम समय में, व्यापक प्रमाण में, सबने इन योजनाओं को स्वीकारा है I मैंने एक छोटी सी गुज़ारिश की थी कि रक्षाबंधन के पर्व पर हम अपनी बहनों को ये सुरक्षा योजना दें I मेरे पास जो मोटी-मोटी जानकारी आई है कि योजना आरम्भ होने से अब तक ग्यारह करोड़ परिवार इस योजना से जुड़े हैं | और मुझे ये भी बताया गया कि, क़रीब-क़रीब आधा लाभ, माताओं-बहनों को मिला है I मैं इसे शुभ संकेत मानता हूँ I मैं सभी माताओं-बहनों को रक्षाबंधन के पावन पर्व की अनेक-अनेक शुभकामनायें भी देता हूँ I आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूँ, जन-धन योजना को एक वर्ष पहले बड़े पैमाने पर हाथ में लिया गया था I जो काम साठ साल में नहीं हुआ, वो इतने कम समय में होगा क्या ? कई सवालिया निशान थे I लेकिन मुझे आज ख़ुशी है कि इस योजना को लागू करने से संबंधित सरकार की सभी इकाइयों ने, बैंक की सभी इकाइयों ने, जी-जान से सब जुट गये, सफ़लता पाई और अब तक मेरी जानकारी के अनुसार क़रीब पौने अठारह करोड़ बैंक खाते खोले गए I सत्रह करोड़ चौहत्तर लाख I मैंने गरीबों की अमीरी भी देखी | ज़ीरो बैलेंस से खाता खोलना था लेकिन गरीबों ने बचत करके, सेविंग करके बाइस हज़ार करोड़ की राशि जमा करवाई I अर्थव्यवस्था की मुख्य धारा, बैंकिंग क्षेत्र भी है और ये व्यवस्था ग़रीब के घर तक पहुँचे इसलिए बैंक मित्र की योजना को भी बल दिया है I आज सवा लाख से भी ज़्यादा बैंक मित्र देश भर में काम कर रहे हैं I नौजवानों को रोज़गार भी मिला है I आपको जानकर के ख़ुशी होगी कि इस एक वर्ष में, बैंकिंग सेक्टर, अर्थव्यवस्था और ग़रीब आदमी - इनको जोड़ने के लिए एक लाख इकत्तीस हज़ार फाईनेंशियल लिटरेसी कैम्प लगाये गए हैं I सिर्फ़ खाते खोलकर के अटक नहीं जाना है और अब तो कई हजारों लोग इस जन-धन योजना के तहत ओवरड्राफ्ट लेने के हक़दार भी बन गए और उन्होंने लिया भी I और ग़रीब को बैंक से पैसा मिल सकता है ये विश्वास भी पैदा हुआ I मैं फिर एक बार, संबंधित सब को बधाई देता हूँ और बैंक के अकाउंट खोलने वाले सभी, ग़रीब से ग़रीब भाइयों-बहनों को भी आग्रह करता हूँ, कि, आप बैंक से नाता टूटने मत दीजिये I ये बैंक आपकी है, आपने इसको अब छोड़ना नहीं चाहिये I मैं आप तक लाया हूँ, अब उसको पकड़ के रखना आपका काम है I हमारे सबके खाते सक्रिय होने चाहियेI आप ज़रूर करेंगे, मुझे विश्वास है I

पिछले दिनों गुजरात की घटनाओं ने, हिंसा के तांडव ने, सारे देश को बेचैन बना दिया और स्वाभाविक है कि गाँधी और सरदार की भूमि पर कुछ भी हो जाए तो देश को सबसे पहले सदमा पहुँचता है, पीड़ा होती है I लेकिन बहुत ही कम समय में गुजरात के प्रबुद्ध, सभी मेरे नागरिक भाइयों और बहनों ने परिस्थिति को संभाल लिया I स्थिति को बिगड़ने से रोकने में सक्रिय भूमिका निभाई और फिर एक बार शांति के मार्ग पर गुजरात चल पड़ा I शांति, एकता, भाईचारा यही रास्ता सही है और विकास के मार्ग पर ही कंधे से कंधा मिलाकर के हमें चलना है I विकास ही हमारी समस्याओं का समाधान है I

पिछले दिनों मुझे सूफ़ी परम्परा के विद्वानों से मिलने का अवसर मिला | उनकी बातें सुनने का अवसर मिला I और मैं सच बताता हूँ कि जिस तज़ुर्बे से, जिस प्रकार से, उनकी बातें मुझे सुनने का अवसर मिला एक प्रकार से जैसे कोई संगीत बज रहा है I उनके शब्दों का चयन, उनका बातचीत का तरीका, यानि सूफ़ी परम्परा में जो उदारता है, जो सौम्यता है, जिसमें एक संगीत का लय है, उन सबकी अनुभूति इन विद्वानों के बीच में मुझे हुई I मुझे बहुत अच्छा लगा I शायद दुनिया को इस्लाम के सही स्वरुप को सही रूप में पहुँचाना  सबसे अधिक आवश्यक हो गया है I मुझे विश्वास है कि सूफ़ी परम्परा जो प्रेम से जुड़ा हुआ है, उदारता से जुड़ा हुआ है, वे इस संदेश को दूर-दूर तक पहुँचायेंगे, जो मानव-जाति को लाभ करेगा, इस्लाम का भी लाभ करेगाI और मैं औरों को भी कहता हूँ कि हम किसी भी संप्रदाय को क्यों न मानते हों, लेकिन, कभी सूफ़ी परम्परा को समझना चाहिये I
 
आने वाले दिनों में मुझे एक और अवसर मिलने वाला है, और इस निमंत्रण को मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ | भारत में, विश्व के कई देशों के बौद्ध परंपरा के विद्वान बोधगया में आने वाले हैं, और मानवजाति से जुड़े हुए वैश्विक विषयों पर चर्चा करने वाले हैं, मुझे भी उसमें निमंत्रण मिला है, और मेरे लिए खुशी की बात है कि उन लोगों ने मुझे बोधगया आने का निमंत्रण दिया है | भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु बोधगया गए थे | मुझे विश्व भर के इन विद्वानों के साथ, बोधगया जाने का अवसर मिलने वाला है, मेरे लिए एक बहुत ही आनंद का पल है |

मेरे प्यारे किसान भाइयो-बहनों, मैं फिर एक बार आप को विशेष रूप से आज मन की बात बताना चाहता हूँ | मैं पहले भी ‘मन की बात’ में, इस विषय का जिक्र कर चुका हूं | आप ने सुना होगा, संसद में मुझे सुना होगा, सार्वजनिक सभाओं मे सुना होगा, ‘मन की बात’ में सुना होगा | मैं हर बार एक बात कहता आया हूँ, कि जिस ‘लैंड-एक्विज़िशन  एक्ट’ के सम्बन्ध में विवाद चल रहा है, उसके विषय में सरकार का मन खुला है | किसानों के हित के किसी भी सुझाव को मैं स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ, ये बार-बार मैं कहता रहा हूं | लेकिन आज मुझे, मेरे किसान भाइयों-बहनों को ये कहना है कि ‘लैंड-एक्विज़िशन एक्ट’ में सुधार की बात राज्यों की तरफ से आई, आग्रहपूर्वक आई और सब को लगता था, कि गाँव, ग़रीब किसान का अगर भला करना है, खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए नहरें बनानी हैं, गाँव में बिजली पहुँचाने के लिए खम्बे लगाने हैं, गाँव के लिए सड़क बनानी है, गाँव के ग़रीबों के लिए घर बनाने हैं, गाँव के ग़रीब नौजवानों को रोज़गार के लिए व्यवस्थायें उपलब्ध करानी हैं, तो हमें ये अफ़सरशाही के चंगुल से, कानून को निकालना पड़ेगा और तब जाकर के सुधार का प्रस्ताव आया था | लेकिन मैंने देखा कि इतने भ्रम फैलाए गए, किसान को इतना भयभीत कर दिया गया | मेरे किसान भाइयो-बहनो, मेरा किसान न भ्रमित होना चाहिये, और भयभीत तो कतई ही नहीं होना चाहिए, और मैं ऐसा कोई अवसर किसी को देना नहीं चाहता हूं, जो किसानों को भयभीत करे, किसानों को भ्रमित करे, और मेरे लिए देश में, हर एक आवाज़ का महत्व है, लेकिन किसानों की आवाज़ का विशेष महत्व है | हमने एक ऑर्डिनेंस जारी किया था, कल 31 अगस्त को ऑर्डिनेंस की सीमा समाप्त हो रही है, और मैंने तय किया है, समाप्त होने दिया जाए | मतलब ये हुआ, कि मेरी सरकार बनी, उसके पहले जो स्थिति थी, वो अब पुनःप्रस्थापित हो चुकी है | लेकिन उसमें एक काम अधूरा था, और वो था - 13 ऐसे बिंदु थे, जिसको एक साल में पूर्ण करना था और इसलिए हम ऑर्डिनेंस में उसको लाये थे, लेकिन इन विवादों के रहते वो मामला भी उलझ गया | आर्डिनेंस तो समाप्त हो रहा है, लेकिन जिससे किसानों को सीधा लाभ मिलने वाला है, किसानों का सीधा आर्थिक लाभ जिससे जुड़ा हुआ है, उन 13 बिंदुओं को, हम नियमों के तहत लाकर के, आज ही लागू कर रहे हैं ताकि किसानों को नुकसान न हो, आर्थिक हानि न हो, और इसलिए जिन 13 बिन्दुओं को लागू करना पहले के कानून में बाकी था, उसको आज हम पूरा कर रहे हैं, और मेरे किसान भाइयों और बहनों को मैं विश्वास दिलाता हूँ, कि हमारे लिए ‘’जय-जवान, जय-किसान’ ये नारा नहीं है, ये हमारा मंत्र है - गाँव, ग़रीब किसान का कल्याण - और तभी तो हमने 15 अगस्त को कहा था, कि सिर्फ कृषि विभाग नहीं, लेकिन कृषि एवं किसान कल्याण विभाग बनाया जायेगा, जिसका निर्णय हमने बहुत तेज़ी से आगे बढ़ाया है | तो मेरे किसान भाइयो-बहनो, अब न भ्रम का कोई कारण है, और न ही कोई भयभीत करने का प्रयास करे, तो आपको भयभीत होने की आवश्यकता है |

मुझे एक बात और भी कहनी है कि दो दिन पूर्व 1965 के युद्ध के पचास साल हुए और जब-जब 1965 के युद्ध की बात आती है तो लाल बहादुर शास्त्री जी की याद आना बहुत स्वाभाविक है I “जय-जवान, जय-किसान” मंत्र भी याद आना बहुत स्वाभाविक है I और भारत के तिरंगे झंडे को, उसकी आन-बान-शान बनाये रखने वाले, उन सभी शहीदों का स्मरण होना बहुत स्वाभाविक है I 65 के युद्ध के विजय के सभी संबंधितों को मैं प्रणाम करता हूँ | वीरों को नमन करता हूँ I और ऐसी इतिहास की घटनाओं से हमें निरंतर प्रेरणा मिलती रहे I

जिस प्रकार से पिछले सप्ताह मुझे सूफ़ी परम्परा के लोगों से मिलने का अवसर मिला उसी प्रकार से एक बड़ा सुखद अनुभव रहा | मुझे देश के गणमान्य वैज्ञानिकों के साथ घंटों तक बातें करने का अवसर मिला I उनको सुनने का अवसर मिला, और मुझे प्रसन्नता हुई कि साइंस के क्षेत्र में, भारत कई दिशाओं में, बहुत ही उत्तम प्रकार के काम कर रहा है I हमारे वैज्ञानिक, सचमुच में उत्तम प्रकार का काम कर रहे हैं I अब हमारे सामने अवसर है कि इन संशोधनों को जन-सामान्य तक कैसे पहुँचायें ? सिद्धांतों को उपकरणों में कैसे तब्दील करें ? लैब को लैंड के साथ कैसे जोड़ें ? एक अवसर के रूप में उसको आगे बढ़ाना है I कई नई जानकारियां भी मुझे मिलीं I मैं कह सकता हूँ कि मेरे लिए वो एक बहुत ही इंस्पायरिंग भी था, एजुकेटिव भी था I और मैंने देखा, कई नौजवान वैज्ञानिक क्या उमंग से बातें बता रहे थे, कैसे सपने उनकी आँखों में दिखाई दे रहे थे I और जब मैंने पिछली बार ‘मन की बात’ में कहा था कि हमारे विद्यार्थियों को विज्ञान की ओर आगे बढ़ना चाहिये I इस मीटिंग के बाद मुझे लगता है कि बहुत अवसर हैं, बहुत संभावनाएं हैं | मैं फिर से एक बार उसको दोहराना चाहूँगा | सभी नौजवान मित्र साइंस की तरफ़ रूचि लें, हमारे एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस  भी विद्यार्थियों को प्रेरित करें |

मुझे नागरिकों से कई चिट्ठियाँ आती रहती हैं | ठाणे से, श्रीमान परिमल शाह ने ‘माई गॉव डॉट इन’ पर मुझे एजुकेशनल रिफॉर्म्स के संबंध में लिखा है | स्किल्ड डेवलपमेंट के लिए लिखा है | तमिलनाडु के चिदंबरम से श्रीमान प्रकाश त्रिपाठी ने प्राइमरी शिक्षा के लिए अच्छे शिक्षकों की ज़रूरत पर बल दिया है | शिक्षा क्षेत्र में सुधारों पर बल दिया है |

मुझे ख़ास मेरे नौजवान मित्रों को भी एक बात कहनी है कि मैंने 15 अगस्त को लालकिले पर से कहा था, कि निचले स्तर के नौकरी के लिए ये इंटरव्यू क्यों ? और फ़िर जब इंटरव्यू का कॉल आता है तो हर गरीब परिवार, विधवा माँ, सिफारिश कहाँ से मिलेगी, किसकी मदद से नौकरी मिलेगी, जैक किसका लगायेंगे ? पता नहीं कैसे-कैसे शब्द प्रयोग हो रहे हैं ? सब लोग दौड़ते हैं, और शायद नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार का ये भी एक कारण है | और मैंने 15 अगस्त को कहा था कि मैं चाहता हूँ कि इंटरव्यू की परम्परा से एक स्तर से नीचे तो मुक्ति होनी चाहिये | मुझे खुशी है कि इतने कम समय में, अभी 15 दिन हुए हैं, लेकिन सरकार, बहुत ही तेज़ी से आगे बढ़ रही है | सूचनायें भेजी जा रही हैं, और क़रीब-क़रीब अब निर्णय अमल भी हो जायेगा कि इंटरव्यू के चक्कर से छोटी-छोटी नौकरियाँ छूट जायेंगी | ग़रीब को सिफ़ारिश के लिए दौड़ना नहीं पड़ेगा | एक्सप्लॉयटेशन नहीं होगा, करप्शन नहीं होगा|

इन दिनों भारत में विश्व के कई देशों के मेहमान आये हैं | स्वास्थ्य के लिए, ख़ासकर के माता-मृत्युदर और शिशु-मृत्युदर कम हो, उसकी कार्य योजना के लिए ‘कॉल टू एक्शन’ दुनिया के 24 देश मिलकर के भारत की भूमि में चिंतन किया | अमेरिका के बाहर ये पहली बार, किसी और देश में ये कार्यक्रम हुआ | और ये बात सही है कि आज भी हमारे देश में हर वर्ष क़रीब-क़रीब 50 हज़ार मातायें और 13 लाख बच्चे, प्रसूति के समय ही और उसके तत्काल बाद ही उनकी मृत्यु हो जाती है | ये चिन्ताजनक है और डरावना है | वैसे सुधार काफ़ी हुआ है | अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की सराहना भी होने लगी है, फ़िर भी ये आंकड़ा कम नहीं है | जैसे हम लोगों ने पोलियो से मुक्ति पाई, वैसे ही, माताओं और शिशु के मृत्यु में टिटनेस, उससे भी मुक्ति पाई | विश्व ने इसको स्वीकारा है | लेकिन हमें अभी भी हमारी माताओं को बचाना है, हमारे नवजात बच्चों को बचाना है |                       
भाइयो-बहनो, आजकल डेंगू की खबर आती रहती है | ये बात सही है कि डेंगू खतरनाक है, लेकिन उसका बचाव बहुत आसान है I और जो मैं स्वच्छ भारत की बात कर रहा हूँ न, उससे वो सीधा-सीधा जुड़ा हुआ है I टी.वी. पर हम एडवरटाइजमेंट देखते हैं, लेकिन हमारा ध्यान नहीं जाता है I अखबार में एडवरटाइजमेंट छपती है, लेकिन हमारा ध्यान नहीं जाता है I घर में छोटी-छोटी चीज़ों में सफाई शुद्ध पानी से भी रख-रखाव करने के तरीके हैं I इन बातों में व्यापक लोक-शिक्षा हो रही है, लेकिन हमारा ध्यान नहीं जाता है और कभी-कभी लगता है कि हम तो बहुत ही अच्छे घर में रहते हैं, बहुत ही बढ़िया व्यवस्था वाले हैं और पता नहीं होता है कि हमारे ही कहीं पानी भरा हुआ है और कहीं हम डेंगू को निमंत्रण दे देते हैं I मैं आप सब से यही आग्रह करूँगा कि मौत को हमने इतना सस्ता नहीं बनने देना चाहिए I ज़िंदगी बहुत मूल्यवान है I पानी की बेध्यानी, स्वच्छता पर उदासीनता, ये मृत्यु का कारण बन जाएं, ये तो ठीक नहीं है ! पूरे देश में करीब 514 केन्द्रों पर डेंगू के लिए मुफ़्त में जांच की सुविधायें उपलब्ध हैं I समय से रहते ही, जांच करवाना ही जीवन रक्षा के लिए उपयोगी है और इसमें आप सबका साथ-सहयोग बहुत आवश्यक है I और स्वच्छता को तो बहुत महत्व देना चाहिए I इन दिनों तो रक्षा-बंधन से दीवाली तक एक प्रकार से हमारे देश में उत्सव ही उत्सव होते हैं I हमारे हर उत्सव को स्वच्छता के साथ अब क्यों न जोड़ें? आप देखिये संस्कार स्वभाव बन जाएंगे I

मेरे प्यारे देशवासियो, आज मुझे एक खुशखबरी सुनानी है आपको, मैं हमेशा कहता हूँ कि अब हमें देश के लिए मरने का सौभाग्य नहीं मिलेगा, लेकिन देश के लिए जीने का तो सौभाग्य मिला ही है I हमारे देश के दो नौजवान और दोनों भाई और वे भी मूल हमारे महाराष्ट्र के नासिक के - डॉ. हितेंद्र महाजन, डॉ. महेंद्र महाजन, लेकिन इनके दिल में भारत के आदिवासियों की सेवा करने का भाव प्रबल रहता है I इन दोनों भाइयों ने भारत का गौरव बढ़ाया है I अमेरिका में ‘रेस अक्रॉस अमेरिका’ एक साईकिल-रेस होती है, बड़ी कठिन होती है, करीब चार हजार आठ सौ किलोमीटर लम्बी रेस होती है I इस वर्ष इन दोनों भाइयों ने इस रेस में विजय प्राप्त किया I भारत का सम्मान बढ़ाया I मैं इन दोनों भाइयों को बहुत-बहुत शुभकामनायें देता हूँ, बहुत-बहुत बधाई देता हूँ, अभिनंदन करता हूँ I लेकिन सबसे ज्यादा मुझे इस बात की खुशी हुई कि उनका ये सारा अभियान ‘टीम इंडिया - विज़न फॉर ट्राइबल्स’ आदिवासियों के लिए कुछ कर गुज़रने के इरादे से वो करते हैंI देखिये, देश को आगे बढ़ाने के लिए हर कोई कैसे अपने-अपने प्रयास कर रहा है I और यही तो हैं, जब ऐसी घटनाएं सुनते हैं तो सीना तन जाता है I

कभी-कभार परसेप्शन के कारण हम हमारे युवकों के साथ घोर अन्याय कर देते हैं I और पुरानी पीढ़ी को हमेशा लगता है, नई पीढ़ी को कुछ समझ नहीं है और मैं समझता हूँ ये सिलसिला तो सदियों से चला आया है I मेरा युवकों के संबंध में अनुभव अलग है I कभी-कभी तो युवकों से बातें करते हैं तो हमें भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है I मैं कई ऐसे युवकों को मिला हूँ जो कहते हैं कि भई, मैंने तो जीवन में व्रत लिया हुआ है ‘संडे ऑन साइकिल’ | कुछ लोग कहते हैं कि मैंने तो सप्ताह में एक दिन साइकिल-डे रखा हुआ है I मेरी हेल्थ के लिए भी अच्छा रहता है I एनवारनमेंट के लिए भी अच्छा रहता है I और मुझे अपने युवा होने का बड़ा आनंद भी आता है I आजकल तो हमारे देश में भी साइकिल कई शहरों में चलती है और साइकिल को प्रमोट करने वाले लोग भी बहुत हैं I लेकिन ये पर्यावरण की रक्षा के लिए और स्वास्थ्य के सुधार के लिए अच्छे प्रयास हैं I और आज जब मेरे देश के दो नौजवानों ने अमेरिका में झंडा फहरा दिया, तो भारत के युवक भी जिस दिशा में जो सोचते हैं, उसका उल्लेख करना मुझे अच्छा लगा I

मैं आज विशेष रूप से महाराष्ट्र सरकार को बधाई देना चाहता हूँ I मुझे आनंद होता है I बाबा साहेब अम्बेडकर - मुंबई की ‘ इंदु  मिल’ की ज़मीन - उनका स्मारक बनाने के लिए लम्बे अरसे से मामला लटका पड़ा था I महाराष्ट्र की नई सरकार ने इस काम को पूरा किया और अब वहाँ बाबा साहेब अम्बेडकर का भव्य-दिव्य प्रेरक स्मारक बनेगा, जो हमें दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता रहेगा| लेकिन साथ-साथ, लंदन में डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर जहाँ रहते थे - 10, किंग हेनरी रोड, वो मकान भी अब खरीद लिया है I विश्व भर में सफ़र करने वाले भारतीय जब लंदन जाएंगे तो बाबा साहेब अम्बेडकर जो स्मारक अब महाराष्ट्र सरकार वहाँ बनाने वाली है, वो एक हमारा प्रेरणा-स्थल बनेगा I मैं महाराष्ट्र सरकार को बाबा साहेब अम्बेडकर को सम्मानित करने के इन दोनों प्रयासों के लिए साधुवाद देता हूँ, उनका गौरव करता हूँ, उनका  अभिनन्दन करता हूँ I


मेरे प्यारे भाइयो-बहनो, अगली “मन की बात” आने से पूर्व आप अपने विचार जरुर मुझे बताइये, क्योंकि मेरा विश्वास है कि लोकतंत्र लोक-भागीदारी से चलता है I जन-भागीदारी से चलता है I कंधे से कन्धा मिला करके ही देश आगे बढ़ सकता है I मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनायें I बहुत-बहुत धन्यवाद I

Monday, 17 August 2015

AIR Bhaderwah, RR holds Multilingual Musharia to mark Independence Day Celebration

AIR Bhaderwah, RR holds Multilingual Musharia to mark Independence Day Celebration

Around fifteen renowned poets of Doda district presented their rich poetic works in praise of nation here at a multilingual literary meet jointly organized by All India Radio, Bhaderwah and 4th Battalion of Rashtriya Rifles (RR) as part of the 69th Independence Day Celebration.

The poets received huge applaud from a jam packed elite audience for the poems presented in Kashmiri, Bhaderwahi, Urdu, Siraji and Goojri highlighting the sacrifices given by the national heroes to secure freedom from the foreign rulers. The poetic works recited by the poets also threw light on the underlining spirit of mutual brotherhood and communal harmony that gave much strength to the freedom movement and evolving a strong democratic India in the Post-independence era.

The poets through their inspiring poems called upon the people to shun differences and work jointly towards common cause of evolving a society based on justice, equality, common good and democratic principles, The poets also emphasized the need to fight against the confrontationist forces, corruption and other social evils which have been eating up the vitals of the society and nation as a whole. The programme was held seminar hall of 50 years old premier educational institutional of Bhaderwah town Boys Hr. Sec. School, Bhaderwah.

The programme was attended by civil society members of all communities’ the prominent those who were present at the Multilingual literary meet included Rector Jammu University Bhaderwah Campus, Lt Col 4RR (BIHAR) Sub-Divisional Magistrate Bhaderwah, SP Bhaderwah. The programme was highly appreciated by civil society of Bhaderwah and people suggested to hold such events on regular basis.




Thursday, 13 August 2015

AIR, Doordarshan play a critical role: Prasar Bharati Chairman

AIR, Doordarshan play a critical role: Prasar Bharati Chairman


In a country like India, public service broadcasters like All India Radio and Doordarshan play a critical role in ensuring the unity of diverse communities, Prasar Bharati Chairman P Surya Prakash said today.

"Many people ask me do we need a public service broadcaster? I say, of course we do. In a country as diverse as ours, with the given complexities, social and economic and so on, I think the public service broadcaster plays a very critical role in ensuring the unity of such a diverse community as we have in India," Prakash said.

He was speaking at the 40th Annual Day celebrations of Doordarshan Kendra, Chennai, here.

Claiming that the All India Radio and Doordarshan through its sustained campaign on polio managed to get rid of the disease from the country, he said, "Through our radio and television, every 10 minutes you get this message asking people to take the little babies to the nearest primary centres for polio drops. I cite this as an example of what a public service broadcaster can do in any country."

"Similarly, we in Prasar Bharati are committed to other programmes some of which has been launched by the Prime Minister in the last year or so.

"One of them is Swachh Bharat. About 70 per cent of households in India do not have toilets. You can well imagine what the implications are to the dignity of individuals especially women and security of women. But today given the government's commitment and sustained campaign on All India Radio and Doordarshan, I feel confident that most Indian homes will have toilets in the next 5-7 years," he said.

"I think this happened because All India Radio and Doordarshan are out there to take that message to the last man," he said.

State Governor K Rosaiah said, "The growing competition in media world has paved the way for adopting new technologies to step up their telecast and to make quality programmes to make more and more people to view their channels."

"What is worrying is that we see some TV channels deviating from their path. For the sake of entertainment, they bring about programmes which are of poor quality and that cannot be seen with family," he said.


"There is also a deviation from moral and cultural values. Such programmes have a negative influence on society and in the long run they will deviate the people from the right path," he said.


Source : http://economictimes.indiatimes.com/industry/media/entertainment/media/air-doordarshan-play-a-critical-role-prasar-bharati-chairman/articleshow/48458604.cms

Friday, 7 August 2015

Obituary--R K Nema ADG(NZ) passed away this morning due to Heart Attack



The untimely demise of one of the AIR’s ace technocrats comes to us as a thunderbolt. The void caused by the sudden death of Shri. R.K. Nema, Additional Director General, North-Zone, is hard to fill. Akashvani family is with Shri. Nema’s family in this hour of agony and bereavement.       

R K Nema ADG(NZ) passed away this morning due to Heart Attack. Shri R K Nema ADG (E)(NZ), All India Radio and Doordarshan, Delhi passed away this morning (07.08.2015) at an age of 57 years due to Heart Attack at Delhi. Shri R K Nema was an IBES officer, who had served at AIR Mumbai, AIR Ambikapur, Akashvani Chhindawara, Akashvani Shahdol, Akashvani Raipur and Akashvani Jabalpur before being elevated to the post of Additional Director General(E) and posted at Delhi. Shri R K Nema was an extremely able, soft spoken and upright officer with high degree of administrative and legal knowledge. Shri Nema has left behind him his wife and two sons.

Wednesday, 5 August 2015

FM Radio and the RJ culture


        Resurgence of Radio way back in the 90s was largely due to FM radio.  FM radio took its first faltering steps in 1977 when AIR started the first FM channel on its Chennai station.  What really brought FM to the centre stage was the introduction of round-the-clock stereo FM service by AIR and the experiment in limited deregulation by leasing out slots to private players at the four metros and later on AIR, Panaji in 1993 and 1994.  This experiment in a way is a precursor to the Government policy of issuing licenses to private parties to set up FM stations in the country.  Today, there are around 250 FM channels in the private domain, in addition to 23 FM Rainbow and 5 FM Gold channels of All India Radio.  There are many more private channels in the pipeline.  The city dwellers, craving for infotainment, were captivated by FM.  Indeed listening to FM became the fashion of the day especially with the youth.  With the proliferation of the inexpensive FM receivers, car radios and mobile devices, FM received tremendous impetus and has become a major money-spinner through advertising revenue. 

            FM brought in the radio jockey culture.  Listener-friendly programming tailored to the tastes with perky presentation by young radio jockeys and presenters full of verve and vivacity caught the imagination of audiences everywhere.  All India Radio, as the pioneer in FM broadcasting, has the privilege of grooming several radio jockeys who have become household names in different parts of India.  Even before the advent of FM, AIR has been using stock characters for compering its programmes for children, women and rural folk/farmers.  With their ability to communicate in the local dialect and idiom, they could establish instant rapport with the target audiences and enjoyed their trust. 

            To meet the manpower requirements of sudden and rapid expansion of AIR’s network including its Rainbow/Gold channels, AIR has been engaging announcers, radio jockeys and anchors on casual assignment basis subject to exigencies.  Some of the on-air personalities, with their captivating style and panache, became youth icons enjoying huge fan following.   Their success is a matter to rejoice for AIR which has scouted and nurtured such talent.  But then, as they say, it takes all sorts to make a world.  Some misguided RJs of FM Rainbow and FM Gold have started an orchestrated and vicious campaign to tarnish the image of AIR, spreading a canard to mislead the public at large.  They did not hesitate even to besmirch reputation of their supervising officers with wild innuendoes and insinuations with utter disregard for canons of decency and decorum.    
  
            In their latest complaint, they have talked about an undertaking which they were required to submit if they are on the panel of multichannel stations of AIR.  As there is abundant talent, AIR has been able to empanel a large number of them from time to time.  To bring in variety, AIR does not allow more than six bookings/assignments in a month or 72 in a year.  This limit is strictly adhered to all over the vast AIR network, including FM Rainbow/FM Gold.  But it has come to the notice of AIR that some casual presenters at multichannel stations of AIR were shifting from one channel to another in a deliberate and surreptitious attempt to exceed this limit.  Prominent among the multichannel stations of AIR is the set-up in Delhi with its Rajdhani, Indraprastha, Vividh Bharati, FM Rainbow and FM Gold channels, apart from channels of ESD, GOS in particular, National Channel of AIR, Urdu Service of AIR etc.  AIR has devised an undertaking to arrest this trend.  Some casual announcers/RJs are peeved about submission of such an undertaking as they have been managing on the sly to satisfy their rapacity at the expense of AIR’s established norms. 

            RJs are not repeat NOT on the establishment of All India Radio.  And each panel of casual RJs is subject to review so that in a fiercely competitive market, AIR is able to compete and fulfill its mandate.  This temporary panel is similar to the ones we have in respect of comperes, drama voices, singers, composers, instrumentalists, field investigators for Audience Research and part-time Correspondents.  One voice in one area in perpetuity tends to sound stale and monotonous, weaning away the public as well as the advertisers.  In a nutshell, AIR cannot but review its panel on definite frequencies to retain the best and take those who lost their sheen off the air.

AIR has some time-honoured conventions and established practices.  As far as programme presentation is concerned, announcers, RJs and anchors do have the liberty to embellish their shows but AIR does not encourage loud or crass style to helm their programming.  The station managers are alert to ensure that no RJ goes overboard.    

AIR will be happy if the RJs on its panel emerge as channel drivers by sheer dint of their on-air performance, winning adulation and applause from the listening public.  Such jockeys/presenters will always be an ornament on our head but we are wary of those who underperform or vitiate the atmosphere.   Let them not indulge in sullying the image and reputation    -    as a handful few of them are wont to do    -    of the very organization which they have the privilege to work for.  Such tactics are unbecoming of true broadcast professionals. AIR is duty-bound to safeguard its regulations in the professional interests of the Organization which under no circumstances will be compromised.


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