Monday, 30 November 2015


March 2012. It was a memorial concert for Dr Bhupen Hazarika in Shillong a few months
after his demise. Organized by the North Eastern Service (NES) of AIR. Waves of applause
had greeted the announcement of the song Shillongorey Monalisa Lyngdoh by the maestro’s brother Samar Hazarika.

What is it about this song that continues to pull the crowds forty years after it was first sung, I
remember thinking. A cult classic that is loved by Assamese and Khasi-Jaintias alike…

That’s when I decided to tell the story of Monalisa. The beautiful Khasi maiden from
Shillong, who captures the heart of an Assamese youth. And the imagination of successive

Monalisa with her guitar, immortalised by Dr Bhupen Hazarika in this much-

This story got told in September 2015 when AIR marked the birth anniversary of the Bard of
Brahmaputra with a feature titled “MONALISA – A GIRL, A SONG AND A DREAM”.  

Shillongorey Monalisa Lyngdoh is a symbolic love song between an Assamese boy and a
Khasi girl, a plains man and a hill maiden, a nontribal and a tribal, and a Hindu and a
Christian. The story of sundering of romance between the pair is an allegory for the
separation of a political kind – the carving out of Meghalaya from “Undivided Assam”. On
the other hand, it is also at the same time, a song of harmony, of hope that the separation
between the communities will end one day.  Written in 1972 against the backdrop of the
trauma and upheaval of the division of states.

There was only one name in my mind for the feature’s script writer - noted English author,
classical vocalist and music critic Mitra Phukan from Guwahati. Luckily for me, Mitra
baideo (elder sister) was happy to come on board. “The times that Hazarika lived through
were some of the most momentous in the history of India’s North-east,” she wrote, “with
fragmentation and gory, long drawn feuds being a part of the chronicles of the
times. Singlehandedly, Hazarika strove to build bridges between the feuding factions, through
his lyrics, music, stage presentations and cinema.”

Bhupen Hazarika’s younger brother, late Jayanta Hazarika, had been the lead singer. His wife
Monisha Hazarika had an interesting anecdote to share on how the song got written “within a
few minutes”. At the two-storied house which served as HMV’s temporary recording studio
in Guwahati those days. After standing up Jayanta and the musicians for the whole day at the
studio, Bhupen Hazarika had strolled in at 8pm, asking, “Are we all ready to record?”

“What do you mean, ready?” Jayanta is said to have burst out. “You never gave the song to us!"

"Okay, okay,” said Bhupen. “Let me write it and you shall set it to music.”

Sitting on the ground floor he wrote four lines which were then sent up to Jayanta on the first
floor, who set them to music. The exercise was repeated for the next four lines, and the next...

A 19-year-old JP Das was sitting by his friend Jayanta’s side that day. With his guitar. JP Das
was one of that generation of people who were displaced suddenly by the division of states.
Who was steeped in western music, “specially the Beatles” - his inheritance from the little
Rock and Roll town called Shillong.

The whistling that precedes the song and the harmonizing – an alien concept in Assamese
music of that era – were his contributions to the song, JP Das tells me.
A retired Assistant Station Director of AIR Guwahati, JP Das can look back on a successful
music career today. He is still singing the song at concerts and get-togethers in both states. 
The young crowds are still lapping it up, he informs me.

“Monalisa Lyngdoh, you who live in Shillong, keep on playing hillbilly music with the guitar
in your hands…” goes the opening bars and refrain of the song.

The song will continue to play on, as Padmashri Dr Helen Giri, a stalwart in the realms of arts
and culture in Meghalaya tells us. “Monalisa Lyngdoh needs to play on and on and on,” she stresses.

The radio feature “MONALISA – A GIRL, A SONG AND A DREAM” was awarded the
Public Service Broadcasting Award on November 12 this year. In the true spirit of public
service broadcasting, which seeks to integrate a variety of people in the sutra of enlightened
togetherness and compassion, this programme salutes Dr. Bhupen Hazarika’s stellar efforts to
knit the Northeast together and then meld the Northeast into the mainstream of this diverse
country. The feature is accessible on YouTube here:

As the singers extol the virtues of love transcending all boundaries, as evident from the image
of the two star-crossed lovers meeting in Nongpoh, the mid-point of the journey between
Shillong and Guwahati, the question arises, are we, the people of today, ready to take a step
forward and meet the ‘other’ half-way?

This is a contribution by Ms. Basudha Banerji, PEX, DG: AIR, Delhi. She won the Public Service Broadcasting Award 2015 for her feature “MONALISA – A GIRL, A SONG AND A DREAM". This award is given every year on November 12, which is observed as Public Service Broadcasting Day, to commemorate Mahatma Gandhi's first and only visit to All India Radio on that date in the year 1947. 

Sunday, 29 November 2015

मन की बात : 29 नवंबर 2015

प्यारे देशवासियो, नमस्ते |

दीपावली के पावन पर्व के दरम्यान आपने छुट्टियाँ बहुत अच्छे ढंग से मनायी होंगी | कहीं जाने का अवसर भी मिला होगा | और नए उमंग-उत्साह के साथ व्यापार रोज़गार भी प्रारंभ हो गए होंगे | दूसरी ओर क्रिसमस की तैयारियाँ भी शुरू हो गयी होंगी |  समाज जीवन में उत्सव का अपना एक महत्त्व होता है | कभी उत्सव घाव भरने के लिये काम आते हैं तो कभी उत्सव नई ऊर्ज़ा देते हैं | लेकिन कभी-कभी उत्सव के इस समय में जब संकट आ जाए तो ज्यादा पीड़ादायक हो जाता है, और पीड़ादायक लगता है | दुनिया के हर कोने में से लगातार प्राकृतिक आपदा की ख़बरें आया ही करती हैं | और न कभी सुना हो और न कभी सोचा हो, ऐसी-ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की ख़बरें आती रहती हैं | जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कितना तेजी से बढ़ रहा है यह अब हम लोग अनुभव कर रहे हैं | हमारे ही देश में पिछले दिनों जिस प्रकार से अति वर्षा और वो भी बेमौसमी वर्षा और लम्बे अरसे तक वर्षा, ख़ासकर के तमिलनाडु में जो नुकसान हुआ है और राज्यों को भी इसका असर हुआ है | कई लोगों की जानें गयीं | मैं इस संकट की घड़ी में उन सभी परिवारों के प्रति अपनी शोक-संवेदना प्रकट करता हूँ | राज्य सरकारें राहत और बचाव कार्यों में पूरी शक्ति से जुट जाती हैं | केंद्र सरकार भी हमेशा कंधे से कन्धा मिलाकर काम करती है | अभी भारत सरकार की एक टीम तमिलनाडु गयी हुई है | लेकिन मुझे विश्वास है तमिलनाडु की शक्ति पर इस संकट के बावज़ूद भी वो फ़िर एक बार बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ने लग जाएगा | और देश को आगे बढ़ाने में जो उसकी भूमिका है वो निभाता रहेगा | लेकिन जब ये चारों तरफ़ संकटों की बातें देखते हैं तो हमें इसमें काफी बदलाव लाने की आवश्यकता हो गयी है | आज से 15 साल पहले प्राकृतिक आपदा एक कृषि विभाग का हिस्सा हुआ करता था, क्योंकि तब ज़्यादा से ज़्यादा प्राकृतिक आपदाएँ यानि अकाल यहीं तक सीमित था | आज तो इसका रूप ही बदल गया है | हर लेवल पे हमें अपनी कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए काम करना बहुत अनिवार्य हो गया है | सरकारों ने सिविल सोसाइटी ने, नागरिकों ने, हर छोटी-मोटी संस्थाओं ने बहुत वैज्ञानिक तरीके से कैपेसिटी बिल्डिंग के लिए काम करना ही पड़ेगा | नेपाल के भूकंप के बाद मैंने पकिस्तान के प्रधानमंत्री श्रीमान नवाज़ शरीफ़ से बात की थी | और मैंने उनसे एक सुझाव दिया था कि हम सार्क देशों ने मिल करके डिसास्टर प्रेपेयर्डनेस के लिए एक जॉइंट एक्सरसाइज करना चाहिये | मुझे खुशी है कि सार्क देशों के एक टेबल टॉक एक्सरसाइज और बेस्ट प्रैक्टिसेस का सेमिनार वर्कशॉप दिल्ली में संपन्न हुआ | एक अच्छी शुरुआत हुई है |

   मुझे आज पंजाब के जलंधर से लखविंदर सिंह का फ़ोन मिला है | ‘मैं लखविंदर सिंह, पंजाब जिला जलंधर से बोल रहा हूँ | हम यहाँ पर जैविक खेती करते हैं और काफी लोगों को खेती के बारे में गाइड भी करते हैं | मेरा एक सवाल है कि जो ये खेतों को लोग आग लगाते हैं, पुआल को या गेहूँ के नाड़ को कैसे इनको लोगों को गाइड किया जाए कि धरती माँ को जो सूक्ष्म जीवाणु हैं उन पर कितना खराब कर रहे हैं और जो ये प्रदूषण हो रहा है दिल्ली में, हरियाणा में, पंजाब में इससे कैसे राह मिले |” लखविंदर सिंह जी मुझे बहुत खुशी हुई आपके सन्देश सुन करके | एक तो आनंद इस बात का हुआ कि आप जैविक खेती करने वाले किसान हैं | और स्वयं जैविक खेती करते हैं ये इतना ही नहीं आप किसानों की समस्या को भली-भाँति समझते हैं | और आपकी चिंता सही है लेकिन ये सिर्फ़ पंजाब, हरियाणा में ही होता है ऐसा नहीं है | पूरे हिन्दुस्तान में ये हम लोगों की आदत है और परंपरागत रूप से हम इसी प्रकार से अपने फसल के अवशेषों को जलाने के रास्ते पर चल पड़ते हैं | एक तो पहले नुकसान का अंदाज़ नहीं था | सब करते हैं इसलिए हम करते हैं वो ही आदत थी | दूसरा, उपाय क्या होते हैं उसका भी प्रशिक्षण नहीं हुआ | और उसके कारण ये चलता ही गया, बढ़ता ही गया और आज जो जलवायु परिवर्तन का संकट है, उसमें वो जुड़ता गया | और जब इस संकट का प्रभाव शहरों की ओर आने लगा तो ज़रा आवाज़ भी सुनाई देने लगी | लेकिन आपने जो दर्द व्यक्त किया है वो सही है | सबसे पहला तो उपाय है हमें हमारे किसान भाइयो-बहनों को प्रशिक्षित करना पड़ेगा उनको सत्य समझाना पड़ेगा कि फसल के अवशेष जलाने से हो सकता है समय बचता होगा, मेहनत बचती होगी | अगली फसल के लिए खेत तैयार हो जाता होगा | लेकिन ये सच्चाई नहीं है | फसल के अवशेष भी बहुत कीमती होते हैं | वे अपने आप में वो एक जैविक खाद होता है | हम उसको बर्बाद करते हैं | इतना ही नहीं है अगर उसको छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये जाएँ तो वो पशुओं के लिए तो ड्राई-फ्रूट बन जाता है | दूसरा ये जलाने के कारण ज़मीन की जो ऊपरी परत होती है वो जल जाती है |

     मेरे किसान भाई-बहन पल भर के लिये ये सोचिए कि हमारी हड्डियाँ मज़बूत हों, हमारा ह्रदय मज़बूत हो, किडनी अच्छी हो, सब कुछ हो लेकिन अगर शरीर के ऊपर की चमड़ी जल जाए तो क्या होगा ? हम जिन्दा बच पायेंगे क्या ? हृदय साबुत होगा तो भी जिन्दा नहीं बच पायेंगे | जैसे शरीर की हमारी चमड़ी जल जाए तो जीना मुश्किल हो जाता है | वैसे ही, ये फसल के अवशेष ठूंठ जलाने से सिर्फ़ ठूंठ नहीं जलते, ये पृथ्वी माता की चमड़ी जल जाती है | हमारी जमीन के ऊपर की परत जल जाती है, जो हमारे उर्वरा भूमि को मृत्यु की ओर धकेल देती है | और इसलिए उसके सकारात्मक प्रयास करने चाहिए | इस ठूंठ को फिर से एक बार ज़मीन में दबोच दिया, तो भी वो खाद बन जाता है | या अगर किसी गड्ढे में ढेर करके केंचुए डालकर के थोड़ा पानी डाल दिया तो उत्तम प्रकार का जैविक खाद बन करके आ जाता है | पशु के खाने के काम तो आता ही आता है, और हमारी ज़मीन बचती है इतना ही नहीं, उस ज़मीन में तैयार हुआ खाद उसमें डाला जाए, तो वो डबल फायदा देती है |

    मुझे एक बार केले की खेती करने वाले किसान भाइयों से बातचीत करने का मौका मिला | और उन्होंने मुझे एक बड़ा अच्छा अनुभव बताया | पहले वो जब केले की खेती करते थे और जब केले की फसल समाप्त होती थी तो केले के जो ठूंठ रहते थे, उसको साफ़ करने के लिए प्रति हैक्टर कभी-कभी उनको 5 हज़ार, 10 हज़ार, 15 हज़ार रूपये का खर्च करना पड़ता था | और जब तक उसको उठाने वाले लोग ट्रैक्टर-वैक्टर लेकर आते नहीं तब तक वो ऐसे ही खड़ा रहता था | लेकिन कुछ किसानों ने प्रूव किया उस ठूंठ के ही 6—6, 8-8 इंच के टुकड़े किये और उसको ज़मीन में गाड़ दिए | तो अनुभव ये आया इस केले के ठूंठ में इतना पानी होता है कि जहाँ उसको गाड़ दिया जाता है वहाँ अगर कोई पेड़ है, कोई पौधा है, कोई फसल है तो तीन महीने तक बाहर के पाने की ज़रुरत नहीं पड़ती | वो ठूंठ में जो पानी है, वही पानी फसल को जिन्दा रखता है | और आज़ तो उनके ठूंठ भी बड़े कीमती हो गए हैं | उनके ठूंठ में से ही उनको आय होने लगी है | जो पहले ठूंठ की सफ़ाई का खर्चा करना पड़ता था, आज वो ठूंठ की मांग बढ़ गयी है | छोटा सा प्रयोग भी कितना बड़ा फायदा कर सकता है ये तो हमारे किसान भाई किसी भी वैज्ञानिक से कम नहीं हैं |

      प्यारे देशवासियो आगामी 3 दिसम्बर को ‘इंटरनेशनल डे ऑफ़ पर्सन्स डिसेबिलिटीज़’ पूरा विश्व याद करेगा | पिछली बार ‘मन की बात’ में मैंने ‘ऑर्गन डोनेशन’ पर चर्चा  की थी |  ‘ऑर्गन डोनेशन’ के लिए मैंने नोटो के हेल्पलाइन की भी चर्चा की थी और मुझे बताया गया कि मन की उस बात के बाद फोन कॉल्स में क़रीब 7 गुना वृद्धि हो गयी | और वेबसाइट पर ढाई गुना वृद्धि हो गयी | 27 नवम्बर को ‘इंडियन ऑर्गन डोनेशन डे’ के रूप में मनाया गया | समाज के कई नामी व्यक्तियों ने हिस्सा लिया | फिल्म अभिनेत्री रवीना टंडन सहित बहुत नामी लोग इससे जुड़े | ‘ऑर्गन डोनेशन’ मूल्यवान जिंदगियों को बचा सकता है | ‘अंगदान’ एक प्रकार से अमरता ले करके आ जाता है | एक शरीर से दूसरे शरीर में जब अंग जाता है तो उस अंग को नया जीवन मिल जाता है लेकिन उस जीवन को नयी ज़िंदगी मिल जाती है | इससे बड़ा सर्वोत्तम दान और क्या हो सकता है | ट्रांसप्लांट के लिए इंतज़ार कर रहे मरीज़ों, ऑर्गन डोनर्स, ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन की एक नेशनल रजिस्ट्री 27 नवम्बर को लॉन्च कर दी गयी है | नोटो का लोगो, डोनर कार्ड और स्लोगन डिजाईन करने के लिए ‘माय गोव डॉट इन’ के द्वारा एक नेशनल कम्पटीशन रखी गयी और मेरे लिए ताज्ज़ुब था कि इतने लोगों इतना हिस्सा लिया, इतने इनोवेटिव वे में और बड़ी संवेदना के साथ बातें बताईं | मुझे विश्वास है कि इस क्षेत्र पर भी व्यापक जागरूकता बढ़ेगी और सच्चे अर्थ में जरूरतमंद को उत्तम से उत्तम मदद मिलेगी क्योंकि ये मदद कहीं से और से नहीं मिल सकती जब तक कि कोई दान न करे | जैसे मैंने पहले बताया 3 दिसम्बर विकलांग दिवस के रूप में मनाया जाता है I शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग वे भी एक अप्रतिम साहस और सामर्थ्य के धनी होते हैं I कभी-कभी पीड़ा तब होती है जब कहीं कभी उनका उपहास हो जाता है I कभी-कभार करुणा और दया का भाव प्रकट किया जाता है I लेकिन अगर हम हमारी दृष्टि बदलें, उनकी ओर देखने का नज़रिया बदलें तो ये लोग हमें जीने की प्रेरणा दे सकते हैं |  कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दे सकते हैं | हम छोटी सी भी मुसीबत आ जाए तो रोने के लिए बैठ जाते हैं I तब याद आता है कि मेरा तो संकट बहुत छोटा है ये कैसे गुजारा करता है ? ये कैसे जीता है ? कैसे काम करता है ? और इसलिए ये सब हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं I उनकी संकल्प शक्ति, उनका जीवन के साथ जूझने का तरीका और संकट को भी सामर्थ्य में परिवर्तित कर देने की उनकी ललक काबिले-दाद होती है I

   जावेद अहमद, मैं आज उनकी बात बताना चाहता हूँ I 40–42 साल की उम्र है | 1996 कश्मीर में, जावेद अहमद को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी I वे आतंकियों के शिकार हो गए लेकिन बच गए | लेकिन, आतंकवादियों की गोलियों के कारण किडनी गँवा दी | इंटेस्टाइन और आँत का एक हिस्सा खो दिया I सीरियस नेचर की स्पाइनल इंजरी हो गयी I अपने पैरों पर खड़े होने का सामर्थ्य हमेशा-हमेशा के लिए चला गया, लेकिन जावेद अहमद ने हार नहीं मानी | आतंकवाद की चोट भी उनको चित्त नहीं कर पायी I उनका अपना जज़्बा, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है बिना कारण एक निर्दोष इंसान को इतनी बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ी हो, जवानी खतरे में पड़ गयी हो लेकिन न कोई आक्रोश, न कोई रोष इस संकट को भी जावेद अहमद ने संवेदना में बदल दिया I उन्होंने अपने जीवन को समाजसेवा में अर्पित कर दिया I शरीर साथ नहीं देता है लेकिन 20 साल से वे बच्चों की पढ़ाई में डूब गए हैं | शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार कैसे आएँ | सार्वजानिक स्थानों पर, सरकारी दफ्तरों में विकलांग के लिए व्यवस्थाएँ कैसे विकसित की जाएँ उस पर वो काम कर रहे हैं | उन्होंने अपनी पढ़ाई भी उसी दिशा में ढाल दी I उन्होंने सोशल वर्क में मास्टर डिग्री ले ली और एक समाजसेवक के रूप में एक जागरूक नागरिक के नाते विकलांगों के मसीहा बन कर के वे आज एक साइलेंट रेवोलुशन कर रहे है I क्या जावेद का जीवन हिंदुस्तान के हर कोने में हमे प्रेरणा देने के लिए काफ़ी नहीं है क्या ? I मैं जावेद अहमद के जीवन को, उनकी इस तपस्या को और उनके समर्पण को 3 दिसम्बर को विशेष रूप से याद करता हूँ | समय अभाव में मैं भले ही जावेद की बात कर रहा हूँ लेकिन हिंदुस्तान के हर कोने में ऐसे प्रेरणा के दीप जल रहे हैं | जीने की नई रोशनी दे रहे हैं, रास्ता दिखा रहे हैं | 3 दिसम्बर ऐसे सब हर किसी को याद कर के उनसे प्रेरणा पाने का अवसर है |  हमारा देश इतना विशाल है | बहुत-सी बातें होती हैं जिसमें हम सरकारों पर डिपेंडेंट होते हैं | मध्यम-वर्ग का व्यक्ति हो, निम्न-मध्यम वर्ग का व्यक्ति हो, गरीब हो, दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित उनके लिए तो सरकार के साथ सरकारी व्यवस्थाओं के साथ लगातार संबंध आता है | और एक नागरिक के नाते जीवन में कभी न कभी तो किसी न किसी सरकारी बाबू से बुरा अनुभव आता ही आता है | और वो एकाध बुरा अनुभव जीवन भर हमें सरकारी व्यवस्था के प्रति देखने का हमारा नज़रिया बदल देता है | उसमें सच्चाई भी है लेकिन कभी-कभी इसी सरकार में बैठे हुए लाखों लोग सेवा-भाव से, समर्पण-भाव से, ऐसे उत्तम काम करते हैं जो कभी हमारी नज़र में नहीं आते | कभी हमें पता भी नहीं होता है क्योंकि इतना सहज होता है हमें पता ही नहीं होता है कि कोई सरकारी व्यवस्था, कोई सरकारी मुलाज़िम ये काम कर रहा है |

      हमारे देश में आशा-वर्कर जो पूरे देश में नेटवर्क है | हम भारत के लोगों के बीच में कभी-कभी आशा-वर्कर के संबंध में चर्चा न मैंने सुनी है न आपने सुनी होगी | लेकिन मुझे जब बिलगेट्स फाउंडेशन के विश्व प्रसिद्ध परिवार इंटरप्रेन्योर के रूप में दुनिया में उनकी सफलता एक मिसाल बन चुकी है | ऐसे बिलगेट्स और मिलिंडागेट्स उन दोनों को हमने जॉइंट पद्मविभूषण दिया था पिछली बार I वे भारत में बहुत सामाजिक काम करते हैं |  उनका अपना निवृत्ति का समय और जीवन भर जो कुछ भी कमाया है गरीबों के लिए काम करने में खपा रहे हैं | वे जब भी आते हैं, मिलते हैं और जिन-जिन आशा-वर्कर के साथ उनको काम करने का अवसर मिला है, उनकी इतनी तारीफ़ करते हैं, इतनी तारीफ़ करते हैं, और उनके पास कहने के लिए इतना होता है कि ये आशा-वर्कर को क्या समर्पण है कितनी मेहनत करते है I नया-नया सीखने के लिए कितना उत्साह होता है I ये सारी बातें वो बताते हैं | पिछले दिनों उड़ीसा गवर्नमेंट  ने एक आशा-वर्कर का स्वतंत्रता दिवस पर विशेष सम्मान किया | उड़ीसा के बालासोर ज़िले का एक छोटा सा गाँव तेंदागाँव एक आशा-कार्यकर्ता और वहाँ की सारी जनसंख्या शिड्यूल-ट्राइब की है | अनुसूचित-जनजातियों के वहाँ लोग हैं, ग़रीबी है I और मलेरिया से प्रभावित क्षेत्र है | और इस गाँव की एक आशा-वर्कर जमुना मणिसिंह उसने ठान ली कि अब मैं इस तेंदागाँव में मलेरिया से किसी को मरने नहीं दूँगी | वो घर-घर जाना छोटे सा भी बुखार की ख़बर आ जाए तो पहुँच जाना | उसको जो प्राथमिक व्यवस्थायें सिखाई गई हैं उसके आधार पर उपचार के लिए लग जाना I हर घर कीटनाशक मच्छरदानी का उपयोग करे उस पर बल देना I जैसे अपना ही बच्चा ठीक से सो जाये और जितनी केयर करनी चाहिए वैसी आशा-वर्कर जमुना मणिसिंह पूरा गाँव मच्छरों से बच के रहे इसके लिए पूरे समर्पण भाव से काम करती रहती हैं | और उसने मलेरिया से मुकाबला किया, पूरे गाँव को मुकाबला करने के लिए तैयार किया | ऐसे तो कितनी जमुना मणि होंगी | कितने लाखों लोग होंगे जो हमारे अगल-बगल में होंगे | हम थोड़ा सा उनकी तरफ़ एक आदर भाव से देखेंगे | ऐसे लोग हमारे देश की कितनी बड़ी ताकत बन जाते हैं | समाज के सुख-दुख के कैसे बड़े साथी बन जाते हैं | मैं ऐसे सभी आशा वर्करों को जमुना मणिके माध्यम से उनका गौरवगान करता हूँ |  
      मेरे प्यारे नौजवान मित्रो,  मैंने ख़ास युवा पीढ़ी के लिए जो कि इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं | माई गोव (my gov) उस पर मैंने 3 ई-बुक रखी है I एक ई-बुक है स्वच्छ भारत की प्रेरक घटनाओं को लेकर के, सांसदों के आदर्श ग्राम के संबंध में और हेल्थ सेक्टर के संबंध में, स्वास्थ्य के संबंध में I मैं आपसे आग्रह करता हूँ आप इसको देखिये I देखिये इतना ही नहीं औरों को भी दिखाइये इसको पढ़िए और हो सकता है आपको कोई ऐसी बातें जोड़ने का मन कर जाए I तो ज़रूर आप ‘माई गोव’ को भेज दीजिये I ऐसी बातें ऐसी होती है कि बहुत जल्द हमारे ध्यान में नहीं आती है लेकिन समाज की तो वही सही ताकत होती है I सकारात्मक शक्ति ही सबसे बड़ी ऊर्जा होती है I आप भी अच्छी घटनाओं को शेयर करें I इन ई-बुक्स को शेयर करें I ई-बुक्स पर चर्चा करें और अगर कोई उत्साही नौजवान इन्हीं ई-बुक को लेकर के अड़ोस-पड़ोस के स्कूलों में जाकर के आठवीं, नोवीं, दसवीं कक्षा के बच्चों को बतायें कि देखों भाई ऐसा यहाँ हुआ ऐसा वहाँ हुआ I तो आप सच्चे अर्थ में एक समाज शिक्षक बन सकते है I मैं आपको निमंत्रण देता हूँ आइये राष्ट्र निर्माण में आप भी जुड़ जाइये I
    मेरे प्यारे देशवासियों, पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन से चिंतित है I क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वार्मिंग, डगर-डगर पर उसकी चर्चा भी है चिंता भी है और हर काम को अब करने से पहले एक मानक के रूप में इसको स्वीकृति मिलती जा रही है I पृथ्वी का तापमान अब बढ़ना नहीं चाहिए I ये हर किसी की ज़िम्मेवारी भी है चिंता भी है | और तापमान से बचने का एक सबसे पहला रास्ता है, ऊर्जा की बचत “एनर्जी कन्जर्वेशन” 14 दिसम्बर “नेशनल एनर्जी कन्जर्वेशन दिवस” है I सरकार की तरफ़ से कई योजनायें चल रही हैं I एल.ई.डी. बल्ब की योजना चल रही है I मैंने एक बार कहा था कि पूर्णिमा की रात को स्ट्रीट लाइट बंद करके अँधेरा करके घंटे भर पूर्ण चाँद की रोशनी में नहाना चाहिए I उस चाँद की रोशनी का अनुभव करना चाहिए I एक किसी मित्र ने मुझे एक लिंक भेजा था देखने के लिए और मुझे उसको देखने का अवसर मिला, तो मन कर गया कि मैं आपको भी ये बात बताऊँ I वैसे इसकी क्रेडिट तो ज़ी-न्यूज़ को जाती है I क्योंकि वो लिंक ज़ी-न्यूज़ का था I कानपुर में नूरजहाँ करके एक महिला टीवी पर से लगता नहीं है कोई उसको ज्यादा पढ़ने का सौभाग्य मिला होगा | लेकिन एक ऐसा काम वो कर रही हैं  जो शायद किसी ने सोचा ही नहीं होगा I वह सोलर ऊर्जा से सूर्य शक्ति का उपयोग करते हुए ग़रीबों को रोशनी देने का काम कर रही है I वह अंधेरे से जंग लड़ रही है और अपने नाम को रोशन कर रही है | उसने महिलाओं की एक समिति बनाई है और सोलर ऊर्जा से चलने वाली लालटेन उसका एक प्लांट लगाया है और महीने  के 100/- रू. के किराये से वो लालटेन देती है I लोग शाम को लालटेन ले जाते हैं, सुबह आकर के फिर चार्जिंग के लिए दे जाते हैं और बहुत बड़ी मात्रा में करीब मैंने सुना है कि 500 घरों में लोग आते हैं लालटेन ले जाते हैं I रोज का करीब 3-4 रू. का खर्च होता है लेकिन पूरे घर में रोशनी रहती है और ये नूरजहाँ उस प्लांट में सोलर एनर्जी से ये लालटेन को रिचार्ज करने का दिनभर काम करती रहती है I अब देखिये जलवायु परिवर्तन के लिए विश्व के बड़े-बड़े लोग क्या-क्या करते होंगे लेकिन एक नूरजहाँ शायद हर किसी को प्रेरणा दे, ऐसा काम कर रही है | और वैसे भी, नूरजहाँ को तो मतलब ही है संसार को रोशन करना I इस काम के द्वारा रोशनी फैला रही हैं I मैं नूरजहाँ को बधाई देता हूँ और मैं जी-टीवी को भी बधाई देता हूँ क्योंकि उन्होंने कानपुर के एक छोटे से कोने में चल रहा इस काम देश और दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया I बहुत-बहुत बधाई I

       मुझे उत्तर प्रदेश के श्रीमान अभिषेक कुमार पाण्डे ने एक फ़ोन किया है “जी नमस्कार मैं अभिषेक कुमार पाण्डे बोल रहा हूँ गोरखपुर से बतौर इंटरप्रेनुर मैं आज यहाँ वर्किंग हूँ प्रधानमन्त्री जी को मैं बहुत ही बधाइयाँ देना चाहूँगा कि उन्होंने एक कार्यक्रम शुरू किया मुद्रा बैंक, हम प्रधानमंत्री जी से जानना चाहेंगे कि जो भी ये मुद्रा बैंक चल रहा है इसमें किस तरह से हम जैसे इंटरप्रेन्योरस उधमियों को सपोर्ट किया जा रहा है ? सहयोग किया जा रहा है ?” अभिषेक जी धन्यवाद I गोरखपुर से आपने जो मुझे सन्देश भेजा I प्रधानमंत्री मुद्रा योजना फण्ड द अनफंडेड I  जिसको धनराशि नहीं मिलती है उनको धनराशि मिले I और मकसद है अगर मैं सरल भाषा में समझाऊं तो “3  तीन ई, एंटरप्राइज, अर्निंग, एम्पोवेर्मेंट I मुद्रा एंटरप्राइज को एनकरेज कर रहा है, मुद्रा अर्निंग के अवसर पैदा करता है और मुद्रा सच्चे अर्थ में एम्पॉवर करता है I छोटे-छोटे उद्यमियों को मदद करने के लिए ये मुद्रा योजना चल रही है I वैसे मैं जिस गति से जाना चाहता हूँ वो गति तो अभी आनी बाकी है I लेकिन शुरुआत अच्छी हुई है इतने कम समय में क़रीब 66 लाख़ लोगों  को 42 हज़ार करोड़ रूपया प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से उन लोगों  को मिला I छोटे-छोटे कारोबार करने वाले लोग और मुझे तो ख़ुशी इस बात की हुई कि क़रीब इन  66 लाख़ में 24 लाख़ महिलाए है I और ज़्यादातर ये मदद पाने वाले एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. इस वर्ग के लोग हैं  जो खुद मेहनत करके अपने पैरों पर सम्मान से परिवार को चलाने का प्रयास करते हैं I अभिषेक ने तो खुद ने अपने उत्साह की बात बताई है I मेरे पास भी काफ़ी कुछ ख़बरें आती रहती हैं I मुझे अभी किसी ने बताया कि मुंबई में कोई शैलेश भोसले करके हैं I उन्होंने मुद्रा योजना के तहत बैंक से उनको साढ़े आठ लाख रुपयों का क़र्ज़ मिला I और उन्होंने सीवेज ड्रेंस, सफाई का बिज़नस शुरू किया I मैंने अपने स्वच्छता अभियान के समय संबंध में कहा था कि स्वच्छता अभियान ऐसा है के जो नए इंटरप्रेनुर तैयार करेगा I और शैलेश भोसले ने कर दिखाया I वे एक टैंकर लाये हैं  उस काम को कर रहे है और मुझे बताया गया कि इतने कम समय में 2 लाख़ रूपए तो उन्होंने बैंक को वापिस भी कर दिया I आखिरकार हमारा मुद्रा योजना के तहत ये ही इरादा है I मुझे भोपाल की ममता शर्मा के विषय में किसी ने बताया कि उसको ये प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से बैंक से 40 हज़ार रूपए मिले I वो बटुवा बनाने का काम कर रही है I और बटुवा बनाती  है लेकिन पहले वो ज़्यादा ब्याज़ से पैसे लाती थी और बड़ी मुश्किल से कारोबार को चलती थी I अब उसको अच्छी मात्रा में एक साथ रूपया हाथ आने के कारण उसने अपने काम को आधिक अच्छा बना दिया I और पहले जो अतिरिक्त ब्याज़ के कारण और, और कारणों से उसको जो अधिक खर्चा होता था इन दिनों ये पैसे उसके हाथ में आने के कारण हर महिना क़रीब-क़रीब एक हज़ार रूपए ज़्यादा बचने लग गया I और उनके परिवार को एक अच्छा व्यवसाय भी धीरे-धीरे पनपने लग गया I लेकिन मैं चाहूँगा कि योजना का और प्रचार हो I हमारी सभी बैंक और ज़्यादा संवेदनशील हों और ज़्यादा से ज़्यादा छोटे लोगों को मदद करें I सचमुच में देश की  इकॉनमी  को यही लोग चलाते हैं I छोटा-छोटा काम करने वाले लोग ही देश के अर्थ का आर्थिक शक्ति होते हैं I  हम उसी को बल देना चाहतें है I अच्छा हुआ है लेकिन और अच्छा करना है I

 मेरे प्यारे देशवासियो, 31 अक्टूबर सरदार पटेल की जयंती के दिन मैंने “एक भारत-श्रेष्ठ भारत की चर्चा की थी I ये चीज़े होती है जो समाज जीवन में निरंतर जागरूकता बनी रहनी चाहिये I राष्ट्र्याम जाग्रयाम व्यम “इन्टर्नल विजिलेंस इज़ द प्राइज़ ऑफ़ लिबर्टी” देश की एकता ये संस्कार सरिता चलती रहनी चाहिये I “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” इसको मैं एक योजना का रूप देना चाहता हूँ I माई गोव (my gov) उस पर सुझाव माँगे थे I प्रोग्राम का स्ट्रक्चर कैसा हो ? लोगो क्या हो ? जन-भागीदारी कैसे बढ़े ? क्या रूप हो ? सारे सुझाव के लिए मैंने कहा था I मुझे बताया गया कि काफ़ी सुझाव आ रहे हैं I   लेकिन मैं और अधिक सुझाव की अपेक्षा करता हूँ | बहुत स्पेसिफिक स्कीम की अपेक्षा करता हूँ | और मुझे बताया गया है कि इसमें हिस्सा लेने वालों को सर्टिफिकेट मिलने वाला है | कोई बड़े-बड़े प्राइज भी घोषित किये गए हैं | आप भी अपना क्रिएटिव माइंड लगाइए | एकता अखंडता के इस मन्त्र को ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ इस मन्त्र को एक-एक हिन्दुस्तानी को जोड़ने वाला कैसे बना सकते हैं | कैसी योजना हो, कैसा कार्यक्रम हो | जानदार भी हो, शानदार भी हो, प्राणवान भी हो और हर किसी को जोड़ने के लिए सहज सरल हो | सरकार क्या करे ? समाज क्या करे ? सिविल सोसाइटी क्या करे ? बहुत सी बातें हो सकती हैं | मुझे विश्वास है कि आपके सुझाव ज़रूर काम आयेंगे |

     मेरे प्यारे भाइयो-बहनो, ठण्ड का मौसम शुरू हो रहा है लेकिन ठण्ड में खाने का तो मज़ा आता ही आता है | कपड़े पहनने का मज़ा आता है लेकिन मेरा आग्रह रहेगा व्यायाम कीजिये | मेरा आग्रह रहेगा शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए ज़रूर कुछ न कुछ समय ये अच्छे मौसम का उपयोग व्यायाम-योग उसके लिए ज़रूर करेंगे | और परिवार में ही माहौल बनाये, परिवार का एक उत्सव ही हो एक घंटा सब मिल करके यही करना है | आप देखिये कैसी चेतना आ जाती है | और पूरे दिनभर शरीर कितना साथ देता है | तो अच्छा मौसम है, तो अच्छी आदत भी हो जाए | मेरे प्यारे देशवासियो को फिर एक बार बहुत बहुत शुभकामनाएँ  |
जय हिन्द |

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Friday, 27 November 2015

AIR Hyderabad gets award

AIR Hyderabad gets award

Hyderabad, Nov 26 (INN): The All India Radio, Hyderabad has bagged second prize in "Innovative Category" in the Akashvani Annual Awards-2014 for the programme titled 'Viswa Guru', which was produced by Amabadipudi Murali Krishna, senior Grade Announcer of AIR, Hyderabad.

An Akashvani annual award is a prestigious event conducted at the national level with participation from all AIR stations across the country in various languages. AIR, DDG (Engineering), Narendra Kumari, V. Udaya Sankar, Station Director (I/C) and other staff appreciated Murali Krishna on announcing the award.

On the request of audience the award winning programme will be broadcast again on November 30. The award function will be organized soon in New Delhi, informed Udaya Sankar.

Tuesday, 24 November 2015

Akashvani hosted Rajendra Prasad Memorial Lecture on "Hamara Samay, Samaj aur Mahabharat"


Akashvani hosted Dr. Rajendra Prasad Memorial  Lecture 2015 on "Hamara Samay, Samaj aur  Mahabharat", today at the National Media Centre, New Delhi.
The focus of the lecture was on events of bygone era and its relevance to the present day society.
This was eloquently dealt with by eminent scholar and author of Hindi Dr. Narendra Kohli, who has to his credit illuminating work on reinventing the ancient form of epic writing in modern prose.
Dr. Kohli brought forth various facets of the Mahabharata and correlated them with the present scenario and spoke about how we need to work towards a better, fulfilled and progressive society.
He said the Mahabharta was definitely not a "Yudhashastra, but a Dharamshastra that teaches us the way of life."
Director General of All India Radio, Fayyaz Sheheryar, said, "Interpreting ancient religious philosophies of India is a bounden duty of all free-thinking Indians as we get closer to the truth through our 'Darshana' which is globally adored and eulogised."
"The subject dealt with today is one significant stride in the direction of knitting India internally and welding it with the remaining world which is essentially peace- starved," he added.
Dr. Rajendra Prasad Lecture Series has been a part of Akashvani since 1969 and scholars from various fields come and share their views on this day.
Some of the names who have been a part of this lecture series are Dr. Hazari Prasad Dwivedi, Mahadevi Verma, Dr. Girija Vyas and V.P. Singh.
The lecture, which commemorates the 131st birth anniversary of our Dr. Rajendra Prasad, India's first president, will be broadcast on December 3 at 9.30 p.m.
It was attended by the Chairman, Prasar Bharati, the Director
General of the AIR, Prasar Bharti Board Members, other dignitaries and officers.

Sunday, 22 November 2015

AIR to record and preserve folk songs

New Delhi, Nov 22 (PTI) To preserve India's immensely diverse and rich legacy, public broadcaster All India Radio (AIR) has undertaken a special project to record lakhs of folk songs, sung across states on various occasions, and preserve these for future generations.

Officials told PTI that an important aspect of this project is that folk and ceremonial songs will be recorded in their pristine beauty for posterity.

"This is a unique project and its scale considering India's ethno-linguistic diversity is simply huge. It is planned that over 200 AIR stations across the country would record folk songs, which will be preserved for future generations," a senior official said.

The officials said India's folk song heritage is rich but these songs need to be preserved for posterity. Around 5,000 songs have already been collected as part of this project, they added.

"In some societies, the songs are accompanied by a dholak and a spoon is used to create additional music. So when professional folk singers sing them, often the synthesiser takes place of the spoon. However, the attempt in this project, is to record these songs as they are originally sung," the senior official said.

To ensure that the songs are preserved in a proper manner, it has been planned to not only record these songs but also add original script, its translations in Hindi and English, background note and notations.

The officials said that several workshops have been held in various cities to apprise AIR officials, who are working for this project.

Giving details, another official said that last year, a workshop had been held in Shillong as the northeastern states have a very rich and varied cultural legacy. Workshops have also been held in Dharamshala in Himachal Pradesh and other cities and another one is being planned in Jaipur, the official added.


Friday, 20 November 2015

Akashvani Annual Awards 2014 declared

The Director General, All India Radio, Shri F Sheheryar declared the results of the Akashvani Annual Awards 2014 at All India Radio’s Headquarters in Delhi today.

The prizes were announced at a well-attended function held in the premises of Akashvani Bhavan at the conclusion of a five-day screening session of entries received from AIR stations nationwide.

Instituted in 1974 with a view to promote professional excellence and to bring out the best from the staff working in AIR’s vast network of radio stations and installations, the prizes are awarded annually.

For the year 2014 a total of 128 entries in 12 categories were screened by a jury comprising a galaxy of eminent experts and veteran broadcasters. The Awards are given for outstanding radio plays, documentaries, innovative programmes, musical productions, programmes on science, family welfare, agriculture and so on. There are prizes for best programme on national integration and best programmes for women, youth and children.

The award winning programmes reflect the efforts that go into projecting the country and its abiding values and culture.The Director General commenced his speech on a nostalgic note, harking back to the days when All India Radio as well as Doordarshan were not so advanced in technology but richer in content. He attributed this to reasons “like 23 years of a kind of holiday, not only in recruitment but also in departmental promotions which have resulted in disgruntlement across the board.” Other reasons touched upon included how radio came to be regarded as deprioritised when television arrived, but this happened only in South Asia.

Shri Sheheryar, however, concluded his speech on an optimistic note. “Things are changing and things are changing fast”, he said. “We are resuscitating ourselves, we will rejuvenate and incentivise our professionals…the glory which appears to be dormant will surely appear de novo,” he added.
The DG referred to Prasar Bharati’s herculean efforts in the direction of FMisation which will cover shadow areas created by ailing MW and SW networks. He also apprised the audience of Prasar Bharati’s remarkable and recent achievement in getting professional manpower recruited for the programme and technical wings of the organization despite overwhelming odds. “AIR will now render yeoman service in transforming the world’s largest middle class society in the days to come,” he added on a note of satisfaction.

The topic for the “Special Topic Documentary” category for the Akashvani Annual Awards 2015 was declared on the occasion by Shri O R Niazi, Consultant at the Directorate General of AIR, as “Eternal Vigilance is the Price for Liberty”.

Members of the jury offered valuable and insightful suggestions and advice on the future roadmap for broadcasting.