Sunday, 30 April 2017

‘मन की बात’ प्रसारण तिथि: 30.04.2017

‘मन की बात’
प्रसारण तिथि: 30.04.2017




मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार | हर ‘मन की बात’ से पहले, देश के हर कोने से, हर आयु वर्ग के लोगों से, ‘मन की बात’ को ले करके ढ़ेर सारे सुझाव आते हैं | आकाशवाणी पर आते हैं, NarendraModiApp पर आते हैं, MyGov के माध्यम से आते हैं, फ़ोन के द्वारा आते हैं, recorded message के द्वारा आते हैं | और जब कभी-कभी मैं उसे समय निकाल करके देखता हूँ तो मेरे लिये एक सुखद अनुभव होता है | इतनी विविधताओं से भरी हुई जानकारियाँ मिलती हैं | देश के हर कोने में शक्तियों का अम्बार पड़ा है | साधक की तरह समाज में खपे हुए लोगों का अनगिनत योगदान, दूसरी तरफ़ शायद सरकार की नज़र भी नहीं जाती होगी, ऐसी समस्याओं का भी अम्बार नज़र आता है | शायद व्यवस्था भी आदी हो गयी होगी, लोग भी आदी हो गए होंगे | और मैंने पाया है कि बच्चों की जिज्ञासायें, युवाओं की महत्वाकांक्षायें, बड़ों के अनुभव का निचोड़, भाँति-भाँति की बातें सामने आती हैं | हर बार जितने inputs ‘मन की बात’ के लिये आते हैं, सरकार में उसका detail analysis होता है | सुझाव किस प्रकार के हैं, शिकायतें क्या हैं, लोगों के अनुभव क्या हैं | आमतौर पर यह देखा गया है कि मनुष्य का स्वभाव होता है दूसरे को सलाह देने का | ट्रेन में, बस में जाते और किसी को खांसी आ गयी तो तुरंत दूसरा आकर के कहता कि ऐसा करो | सलाह देना, सुझाव देना, ये जैसा मानो हमारे यहाँ स्वभाव में है | शुरू में ‘मन की बात’ को लेकर के भी जब सुझाव आते थे, सलाह के शब्द सुनाई देते थे, पढ़ने को मिलते थे, तो हमारी टीम को भी यही लगता था कि ये बहुत सारे लोगों को शायद ये आदत होगी, लेकिन हमने ज़रा बारीकी से देखने की कोशिश की तो मैं सचमुच में इतना भाव-विभोर हो गया | ज़्यादातर सुझाव देने वाले लोग वो हैं, मुझ तक पहुँचने का प्रयास करने वाले लोग वो हैं, जो सचमुच में अपने जीवन में कुछ-न-कुछ करते हैं | कुछ अच्छा हो उस पर वो अपनी बुद्धि, शक्ति, सामर्थ्य, परिस्थिति के अनुसार प्रयत्नरत हैं | और ये चीजें जब ध्यान में आयी तो मुझे लगा कि ये सुझाव सामान्य नहीं हैं | ये अनुभव के निचोड़ से निकले हुए हैं | कुछ लोग सुझाव इसलिये भी देतें हैं कि उनको लगता है कि अगर यही विचार वहाँ, जहाँ काम कर रहे हैं, वो विचार अगर और लोग सुनें और उसका एक व्यापक रूप मिल जाए तो बहुत लोगों को फायदा हो सकता है | और इसलिये उनकी स्वाभाविक इच्छा रहती है कि ‘मन की बात’ में अगर इसका ज़िक्र हो जाए | ये सभी बातें मेरी दृष्टि से अत्यंत सकारात्मक हैं | मैं सबसे पहले तो अधिकतम सुझाव जो कि कर्मयोगियों के हैं, समाज के लिये कुछ-न-कुछ कर गुज़रने वाले लोगों के हैं | मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ | इतना ही नहीं मैं किसी बात को जब मैं उल्लेख करता हूँ तो, ऐसी-ऐसी चीजें ध्यान में आती हैं, तो बड़ा ही आनंद होता है | पिछली बात ‘मन की बात’ में कुछ लोगों ने मुझे सुझाव दिया था food waste हो रहा है, उसके संबंध में चिंता जताई थी और मैंने उल्लेख किया | और जब उल्लेख किया तो उसके बाद NarendraModiApp पर, MyGov पर देश के अनेक कोने में से अनेक लोगों ने, कैसे-कैसे innovative ideas के साथ food waste को बचाने के लिये क्या-क्या प्रयोग किये हैं | मैंने भी कभी सोचा नहीं था आज हमारे देश में खासकर के युवा-पीढ़ी, लम्बे अरसे से इस काम को कर रही है | कुछ सामाजिक संस्थायें करती हैं, ये तो हम कई वर्षों से जानते आए हैं, लेकिन मेरे देश के युवा इसमें लगे हुए हैं - ये तो मुझे बाद में पता चला | कइयों ने मुझे videos भेजे हैं | कई स्थान हैं जहाँ रोटी बैंक चल रही हैं | लोग रोटी बैंक में, अपने यहाँ से रोटी जमा करवाते हैं, सब्जी जमा करवाते हैं और जो needy लोग हैं वे वहाँ उसे प्राप्त भी कर लेते हैं | देने वाले को भी संतोष होता है, लेने वाले को भी कभी नीचा नहीं देखना पड़ता है | समाज के सहयोग से कैसे काम होते हैं, इसका ये उदाहरण है |
आज अप्रैल महीना पूर्ण हो रहा है, आखिरी दिवस है | 1 मई को गुजरात और महाराष्ट्र का स्थापना दिवस है | इस अवसर पर दोनों राज्यों के नागरिकों को मेरी तरफ़ से बहुत-बहुत शुभकामनायें | दोनों राज्यों ने विकास की नयी-नयी ऊँचाइयों को पार करने का लगातार प्रयास किया है | देश की उन्नति में योगदान दिया है | और दोनों राज्यों में महापुरुषों की अविरत श्रंखला और समाज के हर क्षेत्र में उनका जीवन हमें प्रेरणा देता रहता है | और इन महापुरुषों को याद करते हुए राज्य के स्थापना दिवस पर 2022, आज़ादी के 75 साल, हम अपने राज्य को, अपने देश को, अपने समाज को, अपने नगर को, अपने परिवार को कहाँ पहुँचाएँगे इसका संकल्प लेना चाहिये | उस संकल्प को सिद्ध करने के लिये योजना बनानी चाहिये और सभी नागरिकों के सहयोग से आगे बढ़ना चाहिये | मेरी इन दोनों राज्यों को बहुत-बहुत शुभकामनायें हैं |
     एक ज़माना था जब climate change ये academic world का विषय रहता था, seminar का विषय रहता था | लेकिन आज, हम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में, हम अनुभव भी करते हैं, अचरज़ भी करते हैं | कुदरत ने भी, खेल के सारे नियम बदल दिये हैं | हमारे देश में मई-जून में जो गर्मी होती है, वो इस बार मार्च-अप्रैल में अनुभव करने की नौबत आ गयी | और मुझे ‘मन की बात’ पर जब मैं लोगों के सुझाव ले रहा था, तो ज़्यादातर सुझाव इन गर्मी के समय में क्या करना चाहिये, उस पर लोगों ने मुझे दिये हैं | वैसे सारी बातें प्रचलित हैं | नया नहीं होता है लेकिन फिर भी समय पर उसका पुनःस्मरण बहुत काम आता है |
कोई श्रीमान प्रशांत कुमार मिश्र, टी.एस. कार्तिक ऐसे अनेक मित्रों ने पक्षियों की चिंता की है | उन्होंने कहा कि बालकनी में, छत पर, पानी रखना चाहिये | और मैंने देखा है कि परिवार के छोटे-छोटे बालक इस बात को बखूबी करते हैं | एक बार उनको ध्यान में आ जाए कि ये पानी क्यों भरना चाहिये तो वो दिन में 10 बार देखने जाते हैं कि जो बर्तन रखा है उसमें पानी है कि नहीं है | और देखते रहते हैं कि पक्षी आये कि नहीं आये | हमें तो लगता है कि ये खेल चल रहा है लेकिन सचमुच में, बालक मन में ये संवेदनायें जगाने का एक अद्भुत अनुभव होता है | आप भी कभी देखिये पशु-पक्षी के साथ थोड़ा सा भी लगाव एक नये आनंद की अनुभूति कराता है |
कुछ दिन पहले मुझे गुजरात से श्रीमान जगत भाई ने अपनी एक किताब भेजी है ‘Save The Sparrows’ और जिसमें उन्होंने गौरैया की संख्या जो कम हो रही है उसकी चिंता तो की है लेकिन स्वयं ने mission mode में उसके संरक्षण के लिये क्या प्रयोग किये हैं, क्या प्रयास किये हैं, बहुत अच्छा वर्णन उस किताब में है | वैसे हमारे देश में तो पशु-पक्षी, प्रकृति उसके साथ सह-जीवन की बात, उस रंग से हम रंगे हुए हैं लेकिन फिर भी ये आवश्यक है कि सामूहिक रूप से ऐसे प्रयासों को बल देना चाहिये | जब मैं गुजरात में मुख्यमंत्री था तो ‘दाऊदी बोहरा समाज’ के धर्मगुरु सैयदना साहब को सौ साल हुए थे | वे 103 साल तक जीवित रहे थे | और उनके सौ साल निमित्त बोहरा समाज ने Burhani foundation  के द्वारा sparrow को बचाने के लिये एक बहुत बड़ा अभियान चलाया था | इसका शुभारम्भ करने का मुझे अवसर मिला था | क़रीब 52 हज़ार bird feeders उन्होंने दुनिया के कोने-कोने में वितरित किये थे | Guinness book of World Records  में भी उसको स्थान मिला था |
कभी-कभी हम इतने व्यस्त होते हैं तो, अखबार देने वाला, दूध देने, सब्जी देने वाला, पोस्टमैन, कोई भी हमारे घर के दरवाजे से आता है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि गर्मी के दिन हैं ज़रा पहले उसको पानी का तो पूछें !
         नौजवान दोस्तो, कुछ बातें आपके साथ भी तो मैं करना चाहता हूँ | मुझे कभी-कभी चिंता हो रही है कि हमारी युवा पीढ़ी में कई लोगों को comfort zone में ही ज़िंदगी गुज़ारने में मज़ा आती है | माँ-बाप भी बड़े एक रक्षात्मक अवस्था में ही उनका लालन-पालन करते हैं | कुछ दूसरे extreme भी होते हैं लेकिन ज़्यादातर comfort zone वाला नज़र आता है | अब परीक्षायें समाप्त हो चुकी हैं | Vacation का मज़ा लेने के लिये योजनायें बन चुकी होंगी | Summer vacation गर्मियां होने के बाद भी ज़रा अच्छा लगता है | लेकिन मैं एक मित्र के रूप में आपका vacation कैसा जाए, कुछ बातें करना चाहता हूँ | मुझे विश्वास है कुछ लोग ज़रूर प्रयोग करेंगे और मुझे बतायेंगे भी | क्या आप vacation के इस समय का उपयोग, मैं तीन सुझाव देता हूँ उसमें से तीनों करें तो बहुत अच्छी बात है लेकिन तीन में से एक करने का प्रयास करें | ये देखें कि new experience हो, प्रयास करें कि new skill का अवसर लें, कोशिश करें कि जिसके विषय में न कभी सुना है, न देखा है, न सोचा है, न जानते हैं फिर भी वहाँ जाने का मन करता है और चले जायें | New places, new experiences, new skills | कभी-कभार किसी चीज को टी.वी. पर देखना या किताब में पढ़ना या परिचितों से सुनना और उसी चीज़ को स्वयं अनुभव करना तो दोनों में आसमान-ज़मीन का अंतर होता है | मैं आपसे आग्रह करूँगा इस vacation में जहाँ भी आपकी जिज्ञासा है उसे जानने के लिये कोशिश कीजिये, नया experiment कीजिये | Experiment positive हो, थोड़ा comfort zone से बाहर ले जाने वाला हो | हम मध्यम-वर्गीय परिवार के हैं, सुखी परिवार के हैं | क्या दोस्तो कभी मन करता है कि reservation किये बिना रेलवे के second class में ticket लेकर के चढ़ जाएँ, कम-से-कम 24 घंटे का सफ़र करें | क्या अनुभव आता है | उन पैसेंजरों की बातें क्या हैं, वो स्टेशन पर उतर कर क्या करते हैं, शायद सालभर में जो सीख नहीं पाते हैं उस 24 घंटे की without reservation वाली, भीड़-भाड़ वाली ट्रेन में सोने को भी न मिले, खड़े-खड़े जाना पड़े | कभी तो अनुभव कीजिये | मैं ये नहीं कहता हूँ बार-बार करिये, एक-आध बार तो करिये | शाम का समय हो अपना football ले करके, volleyball ले करके या कोई भी खेल-कूद का साधन ले करके तद्दन ग़रीब बस्ती में चले जाएँ | उन ग़रीब बालकों के साथ ख़ुद खेलिये, आप देखिये, शायद् ज़िंदगी में खेल का आनंद पहले कभी नहीं मिला होगा - ऐसा आपको मिलेगा | समाज में इस प्रकार की ज़िंदगी गुज़ारने वाले बच्चों को जब आपके साथ खेलने का अवसर मिलेगा, आपने सोचा है उनके जीवन में कितना बड़ा बदलाव आएगा | और मैं विश्वास करता हूँ एक बार जायेंगे, बार-बार जाने का मन कर जाएगा | ये अनुभव आपको बहुत कुछ सिखाएगा | कई volunteer organisations सेवा के काम करते रहते हैं | आप तो Google गुरु से जुड़े हुए हैं उस पर ढूँढिए | किसी ऐसे organisation के साथ 15 दिन, 20 दिन के लिये जुड़ जाइये, चले जाइये, जंगलों में चले जाइये | कभी-कभी बहुत summer camp लगते हैं, personality development के लगते हैं, कई प्रकार के विकास के लिये लगते हैं उसमें शरीक़ हो सकते हैं | लेकिन साथ-साथ कभी आपको लगता है कि आपने ऐसे summer camp किये हों, personality development का course किया हो | आप बिना पैसे लिये समाज के उन लोगों के पास पहुँचे जिनको ऐसा अवसर नहीं है और जो आपने सीखा है, उनको सिखायें | कैसे किया जा सकता है, आप उनको सिखा सकते हैं | मुझे इस बात की भी चिंता सता रही है कि technology दूरियाँ कम करने के लिये आयी, technology सीमायें समाप्त करने के लिये आयी | लेकिन उसका दुष्परिणाम ये हुआ है कि एक ही घर में छः लोग एक ही कमरे में बैठें हों लेकिन दूरियाँ इतनी हों कि कल्पना ही नहीं कर सकते | क्यों ? हर कोई technology से कहीं और busy हो गया है | सामूहिकता भी एक संस्कार है, सामूहिकता एक शक्ति है | दूसरा मैंने कहा कि skill  | क्या आपका मन नहीं करता कि आप कुछ नया सीखें ! आज स्पर्द्धा का युग है | Examination में इतने डूबे हुए रहते हैं | उत्तम से उत्तम अंक पाने के लिये खप जाते हैं, खो जाते हैं | Vacation में भी कोई न कोई coaching class लगा रहता है, अगली exam की चिंता रहती है | कभी-कभी डर लगता है कि robot तो नहीं हो रही हमारी युवा-पीढ़ी | मशीन की तरह ज़िंदगी नहीं गुज़ार रही |
     दोस्तो, जीवन में बहुत-कुछ बनने के सपने, अच्छी बात है, कुछ कर गुज़रने के इरादे अच्छी बात है, और करना भी चाहिये | लेकिन ये भी देखिये कि अपने भीतर जो human element है वो तो कहीं कुंठित नहीं हो रहा है, हम मानवीय गुणों से कहीं दूर तो नहीं चले जा रहे हैं ! Skill development  में इस पहलू पर थोड़ा बल दिया जा सकता है क्या ! Technology से दूर, ख़ुद के साथ समय गुज़ारने का प्रयास | संगीत का कोई वाद्य सीख रहे हैं, कोई नई भाषा के 5-50 वाक्य सीख रहे हैं, तमिल हो, तेलुगु हो, असमिया हो, बांगला हो, मलयालम हो, गुजराती हो, मराठी हो, पंजाबी हो | कितनी विविधताओं से भरा हुआ देश है और नज़र करें तो हमारे अगल-बगल में ही कोई न कोई सिखाने वाला मिल सकता है | Swimming नहीं आता तो swimming सीखें, drawing करें, भले उत्तम drawing नहीं आएगा लेकिन कुछ तो कागज़ पर हाथ लगाने की कोशिश करें | आपका भीतर की जो संवेदना है वो प्रकट होने लग जायेगी | कभी-कभी छोटे-छोटे काम जिसको हम कहते हैं – हमें, क्यों न मन करे, हम सीखें ! आपको car driving तो सीखने का मन करता है ! क्या कभी auto-rickshaw सीखने का मन करता है क्या ! आप cycle तो चला लेते हैं, लेकिन three-wheeler वाली cycle जो लोगों को ले कर के जाते हैं - कभी चलाने की कोशिश की है क्या ! आप देखें ये सारे नये प्रयोग ये skill ऐसी है आपको आनंद भी देगी और जीवन को एक दायरे में जो बाँध दिया है न उससे आपको बाहर निकाल देगी | Out of box कुछ करिये दोस्तो | ज़िंदगी बनाने का यही तो अवसर होता है | और आप सोचते होंगे कि सारी exam, समाप्त हो जाए, Career के नये पड़ाव पर जाऊँगा तब सीखूँगा तो वो तो मौका नहीं आएगा | फिर आप दूसरी झंझट में पड़ जायेंगे और इसलिये मैं आपसे कहूँगा, अगर आपको जादू सीखने का शौक हो तो ताश के पत्तों की जादू सीखिए | अपने यार-दोस्तों को जादू दिखाते रहिये | कुछ-न-कुछ ऐसी चीज़ें जो आप नहीं जानते हैं उसको जानने का प्रयास कीजिये, उससे आपको ज़रूर लाभ होगा | आपके भीतर की मानवीय शक्तियों को चेतना मिलेगी | विकास के लिये बहुत अच्छा अवसर बनेगा | मैं अपने अनुभव से कहता हूँ दुनिया को देखने से जितना सीखने-समझने को मिलता है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते | नये-नये स्थान, नये-नये शहर, नये-नये नगर, नये-नये गाँव, नये-नये इलाके | लेकिन जाने से पहले कहाँ जा रहें - उसका अभ्यास और जा करके एक जिज्ञासु की तरह उसे देखना, समझना, लोगों से चर्चा करना, उनसे पूछना ये अगर प्रयास किया तो उसे देखने का आनंद कुछ और होगा | आप ज़रूर कोशिश कीजिये और तय कीजिये travelling ज्यादा न करें I एक स्थान पर जाकर कर के तीन दिन, चार दिन लगाइये I फिर दूसरे स्थान पर जाइये वहाँ तीन दिन - चार दिन लगाइये I इससे आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा I मैं चाहूँगा और ये भी सही है कि आप जब जा रहे हैं तो मुझे तस्वीर भी share कीजिये I क्या नया देखा ? कहाँ गए थे ? आप Hash tag Incredible India इसका उपयोग कर के अपने इन अनुभवों को share कीजिये I
       दोस्तो, इस बार भारत सरकार ने भी आपके लिये बड़ा अच्छा अवसर दिया है I नई पीढ़ी तो नकद से करीब-करीब मुक्त ही हो रही है I उसको cash की ज़रूरत नहीं है I वो Digital Currency में विश्वास करने लग गई है I आप तो करते हैं लेकिन इसी योजना से आप कमाई भी कर सकते हैं - आपने सोचा है I भारत सरकार की एक योजना है I अगर BHIM App  जो कि आप download करते होंगे I आप उपयोग भी करते होंगे I लेकिन किसी और को refer करें I किसी और को जोड़ें और वो नया व्यक्ति अगर तीन transaction करे, आर्थिक कारोबार तीन बार करे, तो इस काम को करने के लिये आपको 10 रुपये की कमाई होती है I आपके खाते में सरकार की तरफ से 10 रुपये जमा हो जायेगा I अगर दिन में आपने 20 लोगों से करवा लिया तो आप शाम होते-होते 200 रुपये कमा लेंगे I व्यापारियों को भी कमाई हो सकती है, विद्यार्थियों को भी कमाई हो सकती है I और ये योजना 14 अक्टूबर तक है I Digital India बनाने में आपका योगदान होगा I New India के आप एक प्रहरी बन जाएँगे,  तो vacation का vacation और कमाई की कमाई I refer & earn I
आमतौर पर हमारे देश में VIP culture के प्रति एक नफ़रत का माहौल है लेकिन ये इतना गहरा है - ये मुझे अभी-अभी अनुभव हुआ I जब सरकार ने तय कर दिया कि अब हिंदुस्तान में कितना ही बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, वो अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती लगा कर के नहीं घूमेगा I वो एक प्रकार से VIP culture का symbol बन गया था लेकिन अनुभव ये कहता था कि लाल बत्ती तो vehicle पर लगती थी, गाड़ी पर लगती थी, लेकिन धीरे-धीरे-धीरे वो दिमाग में घुस जाती थी और दिमागी तौर पर VIP culture पनप चुका है I अभी तो लाल बत्ती गई है इसके लिये कोई ये तो दावा नहीं कर पायेगा कि दिमाग़ में जो लाल बत्ती घुस गई है वो निकल गई होगी I मुझे बड़ा interesting एक phone call आया I ख़ैर उस phone में उन्होंने आशंका भी व्यक्त की है लेकिन इस समय इतना अंदाज आता है इस phone call से कि सामान्य मानवी ये चीजें पसंद नहीं करता है I उसे दूरी महसूस होती है I
“नमस्कार प्रधामंत्री जी मैं शिवा चौबे बोल रही हूँ, जबलपुर मध्य प्रदेश से I मैं Government के red beacon light ban के बारे में कुछ बोलना चाहती हूँ I मैंने एक लाइन पढ़ी न्यूज़पेपर में जिसमें लिखा था “every Indian is a VIP on a road” ये सुन के मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ और खुशी भी हुई कि आज मेरा टाइम भी उतना ही ज़रूरी है I मुझे ट्रैफिक जाम में नहीं फंसना है और मुझे किसी के लिये रुकना भी नहीं है I तो मैं आपको दिल से बहुत धन्यवाद देना चाहती हूँ इस decision के लिये I और ये जो आपने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है इसमें हमारा देश ही नहीं साफ़ हो रहा है, हमारी रोडो से VIP की दादागिरी भी साफ हो रही है - तो उसके लिये धन्यवाद I”
सरकारी निर्णय से लाल बत्ती का जाना वो तो एक व्यवस्था का हिस्सा है I लेकिन मन से भी हमें प्रयत्नपूर्वक इसे निकालना है I हम सब मिल कर के जागरूक प्रयास करेंगे तो निकल सकता है I New India का हमारा concept यही है कि देश में VIP की जगह पर EPI का महत्व बढ़े | और जब मैं VIP के स्थान पर EPI कह रहा हूँ तो मेरा भाव स्पष्ट है - Every Person is Important | हर व्यक्ति का महत्व है, हर व्यक्ति का माहात्म्य है I सवा-सौ करोड़ देशवासियों का महत्व हम स्वीकार करें, सवा-सौ करोड़ देशवासियों का माहात्म्य स्वीकार करें तो महान सपनों को पूरा करने के लिये कितनी बड़ी शक्ति एकजुट हो जाएगी I हम सबने मिलकर के करना है I
मेरे प्यारे देशवासियो, मैं हमेशा कहता हूँ कि हम इतिहास को, हमारी संस्कृतियों को, हमारी परम्पराओं को, बार-बार याद करते रहें I उससे हमें ऊर्जा मिलती है, प्रेरणा मिलती है I इस वर्ष हम सवा-सौ करोड़ देशवासी संत रामानुजाचार्य जी की 1000वीं जयंती मना रहे हैं I किसी-न-किसी कारणवश हम इतने बंध गये, इतने छोटे हो गये कि ज्यादा-ज्यादा शताब्दियों तक का ही विचार करते रहे I दुनिया के अन्य देशों के लिये तो शताब्दी का बड़ा महत्व होगा I लेकिन भारत इतना पुरातन राष्ट्र है कि उसके नसीब में हज़ार साल और हज़ार साल से भी पुरानी यादों को मनाने का अवसर हमें मिला है I एक हज़ार साल पहले का समाज कैसा होगा ? सोच कैसी होगी ? थोड़ी कल्पना तो कीजिये I आज भी सामाजिक रुढियों को तोड़ कर के निकलना हो तो कितनी दिक्कत होती है I एक हज़ार साल पहले कैसा होता होगा ? बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि रामानुजाचार्य जी ने समाज में जो बुराइयाँ थी, ऊँच-नीच का भाव था, छूत-अछूत का भाव था, जातिवाद का भाव था, इसके खिलाफ़ बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी थी I स्वयं ने अपने आचरण द्वारा समाज जिनको अछूत मानता था उनको गले लगाया था I हज़ार साल पहले उनके मंदिर प्रवेश के लिये उन्होंने आंदोलन किये थे और सफलतापूर्वक मंदिर प्रवेश करवाये थे I हम कितने भाग्यवान हैं कि हर युग में हमारे समाज की बुराइयों को खत्म करने के लिये हमारे समाज में से ही महापुरुष पैदा हुए हैं I संत रामानुजाचार्य जी की 1000वीं जयंती मना रहे हैं तब, सामाजिक एकता के लिये, संगठन में शक्ति है - इस भाव को जगाने के लिये उनसे हम प्रेरणा लें I
भारत सरकार भी कल 1 मई को ‘संत रामानुजाचार्य’ जी की स्मृति में एक stamp release करने जा रही है I मैं संत रामानुजाचार्य जी को आदर पूर्वक नमन करता हूँ, श्रृद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ I
     मेरे प्यारे देशवासियो, कल 1 मई का एक और भी महत्व है | दुनिया के कई भागों में उसे ‘श्रमिक दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है I और जब ‘श्रमिक दिवस’ की बात आती है, Labour की चर्चा होती है, Labourers की चर्चा होती है तो मुझे बाबा साहब अम्बेडकर की याद आना बहुत स्वाभाविक है I  और बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि आज श्रमिकों को जो सहुलियतें मिली हैं, जो आदर मिला है, उसके लिये हम बाबा साहब के आभारी हैं I श्रमिकों के कल्याण के लिये बाबा साहब का योगदान अविस्मरणीय है I आज जब मैं बाबा साहब की बात करता हूँ, संत रामानुजाचार्य जी की बात करता हूँ तो 12वीं सदी के कर्नाटक के महान संत और सामाजिक सुधारक ‘जगत गुरु बसवेश्वर’ जी की भी याद आती है I कल ही मुझे एक समारोह में जाने का अवसर मिला I उनके वचनामृत के संग्रह को लोकार्पण का वो अवसर था I 12वीं शताब्दी में कन्नड़ भाषा में उन्होंने श्रम, श्रमिक उस पर गहन विचार रखे हैं  I कन्नड़ भाषा में उन्होंने कहा था - “काय कवे कैलास”, उसका अर्थ होता है - आप अपने परिश्रम से ही भगवान शिव के घर कैलाश की प्राप्ति कर सकते हैं यानि कि कर्म करने से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है | दूसरे शब्दों में कहें तो श्रम ही शिव है I मैं बार-बार ‘श्रमेव-जयते’ की बात करता हूँ | ‘Dignity of labour’ की बात करता हूँ I मुझे बराबर याद है भारतीय मज़दूर संघ के जनक और चिन्तक जिन्होंने श्रमिकों के लिए बहुत चिंतन किया ऐसे श्रीमान दत्तोपन्त ठेंगड़ी कहा करते थे - एक तरफ़ माओवाद से प्रेरित विचार था कि “दुनिया के मज़दूर एक हो जाओ” और दत्तोपन्त ठेंगड़ी कहते थे “मज़दूरों आओ दुनिया को एक करें” I एक तरफ़ कहा जाता था- ‘Workers of the world unite’ I  भारतीय चिंतन से निकली हुई विचारधारा को ले करके दत्तोपन्त ठेंगड़ी कहा करते थे - ‘Workers unite the world’ I आज जब श्रमिकों की बात करता हूँ तो दत्तोपन्त ठेंगड़ी जी को याद करना बहुत स्वाभाविक है I
     मेरे प्यारे देशवासियो, कुछ दिन के बाद हम बुद्ध पूर्णिमा मनायेंगे I विश्वभर में भगवान बुद्ध से जुड़े हुए लोग उत्सव मनाते हैं I विश्व आज जिन समस्याओं से गुज़र रहा है हिंसा, युद्ध, विनाशलीला, शस्त्रों की स्पर्द्धा, जब ये वातावरण देखते हैं तो तब, बुद्ध के विचार बहुत ही relevant लगते हैं I और भारत में तो अशोक का जीवन युद्ध से बुद्ध की यात्रा का उत्तम प्रतीक है I मेरा सौभाग्य है कि बुद्ध पूर्णिमा के इस महान पर्व पर United Nations के द्वारा vesak day मनाया जाता है I इस  वर्ष ये श्रीलंका में हो रहा है I इस पवित्र पर्व पर मुझे श्रीलंका में भगवान बुद्ध को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का एक अवसर मिलेगा I उनकी यादों को ताज़ा करने का अवसर मिलेगा I
मेरे प्यारे देशवासियो, भारत में हमेशा ‘सबका साथ-सबका विकास’ इसी मंत्र को ले करके आगे बढ़ने का प्रयास किया है | और जब हम सबका साथ-सबका विकास कहते हैं, तो वो सिर्फ़ भारत के अन्दर ही नहीं - वैश्विक परिवेश में भी है | और ख़ास करके हमारे अड़ोस-पड़ोस देशों के लिए भी है | हमारे अड़ोस-पड़ोस के देशों का साथ भी हो, हमारे अड़ोस-पड़ोस के देशों का विकास भी हो | अनेक प्रकल्प चलते हैं | 5 मई को भारत दक्षिण-एशिया satellite launch करेगा | इस satellite की क्षमता तथा इससे जुड़ी सुविधायें दक्षिण-एशिया के आर्थिक तथा developmental प्राथमिकताओं को पूरा करने में काफ़ी मदद करेगीं | चाहे natural resources mapping करने की बात हो, tele-medicine की बात हो, education का क्षेत्र हो या अधिक गहरी IT connectivity हो, people to people संपर्क का प्रयास हो | South Asia का यह उपग्रह हमारे पूरे क्षेत्र को आगे बढ़ने में पूरा सहायक होगा | पूरे दक्षिण-एशिया के साथ सहयोग बढ़ाने के लिये भारत का एक महत्वपूर्ण कदम है - अनमोल नज़राना है | दक्षिण-एशिया के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का ये एक उपयुक्त उदाहरण है | दक्षिण एशियाई देशों जो कि South Asia Satellite से जुड़े हैं मैं उन सबका इस महत्वपूर्ण प्रयास के लिये स्वागत करता हूँ, शुभकामनायें देता हूँ|
मेरे प्यारे देशवासियो गर्मी बहुत है, अपनों को भी संभालिये, अपने को भी संभालिये | बहुत-बहुत शुभकामनायें | धन्यवाद |            
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Sunday, 26 March 2017

‘मन की बात’ प्रसारण तिथि : 26.03.2017

मेरे प्यारे देशवासियो, आप सबको नमस्कार | देश के हर कोने में ज़्यादातर परिवार अपने बच्चों की exam में जुटे हुए होंगे | जिनकी exam ख़त्म हो गई होगी, वहाँ कुछ relief का माहोल होगा और जहाँ exam चलती होगी, उन परिवारों में अभी भी थोड़ा-बहुत तो pressure होगा ही होगा | लेकिन ऐसे समय मैं यही कहूँगा कि पिछली बार मैंने जो ‘मन की बात’ में विद्यार्थियों से जो-जो बातें की हैं, उसे दोबारा सुन लीजिए, परीक्षा के समय वो बातें ज़रूर आपको काम आएँगी |

आज 26 मार्च है | 26 मार्च बांग्लादेश का स्वतंत्रता का दिवस है | अन्याय के ख़िलाफ़ एक ऐतिहासिक लड़ाई, बंग-बन्धु के नेतृत्व में बांग्लादेश की जनता की अभूतपूर्व विजय | आज के इस महत्वपूर्ण दिवस पर, मैं बांग्लादेश के नागरिक भाइयों-बहनों को स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनायें देता हूँ | और यह कामना करता हूँ कि बांग्लादेश आगे बढ़े, विकास करे और बांग्लादेशवासियों को भी मैं  विश्वास दिलाता हूँ कि भारत बांग्लादेश का एक मज़बूत साथी है, एक अच्छा मित्र है और हम कंधे-से-कंधा मिला करके इस पूरे क्षेत्र के अन्दर शांति, सुरक्षा और विकास में अपना योगदान देते रहेंगे |

हम सबको इस बात का गर्व है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर, उनकी यादें, हमारी एक साझी विरासत है | बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना है | गुरुदेव टैगोर के बारे में एक बहुत interesting बात यह है कि 1913 में वे न केवल नोबेल (Nobel) पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले एशियाई व्यक्ति थे, बल्कि उन्हें अंग्रेज़ों ने ‘Knighthood’ की भी उपाधि दी थी | और जब 1919 में जलियांवाला बाग़ पर अंग्रेज़ों ने क़त्ले-आम किया, तो रवीन्द्रनाथ टैगोर उन महापुरुषों में थे, जिन्होंने अपनी आवाज़ बुलंद की थी और यही कालखंड था, जब 12 साल के एक बच्चे के मन पर इस घटना का गहरा प्रभाव हुआ था | किशोर-अवस्था में खेत-खलिहान में हँसते-कूदते उस बालक को जलियांवाला बाग़ के नृशंस हत्याकांड ने जीवन की एक नयी प्रेरणा दे दी थी | और 1919 में 12 साल का वो बालक भगत हम सबके प्रिय, हम सबकी प्रेरणा - शहीद भगतसिंह | आज से तीन दिन पूर्व, 23 मार्च को भगतसिंह जी को और उनके साथी, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेज़ों ने फांसी पर लटका दिया था और हम सब जानते हैं 23 मार्च की वो घटना - भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु के चेहरे पर माँ-भारती की सेवा करने का संतोष - मृत्यु का भय नहीं था | जीवन के सारे सपने, माँ-भारती की आज़ादी के लिए समाहित कर दिए थे | और ये तीनों वीर आज भी हम  सबकी प्रेरणा हैं | भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान की गाथा को हम शब्दों में अलंकृत भी नहीं कर पाएँगे | और पूरी ब्रिटिश सल्तनत इन तीनों युवकों से डरती थी | जेल में बंद थे, फांसी तय थी, लेकिन इनके साथ कैसे आगे बढ़ा जाये, इसकी चिंता ब्रिटिशरों को लगी रहती थी | और तभी तो 24 मार्च को फांसी देनी थी, लेकिन 23 मार्च को ही दे दी गयी थी | चोरी-छिपे से किया गया था, जो आम तौर पर नहीं किया जाता | और बाद में उनके शरीर को आज के पंजाब में ला करके, अंग्रेजों ने चुपचाप जला दिया था | कई वर्षों पूर्व जब पहली बार मुझे वहाँ जाने का मौका मिला था, उस धरती में एक प्रकार के vibration मैं अनुभव करता था | और मैं देश के नौजवानों को ज़रूर कहूंगा - जब भी मौका मिले तो, पंजाब जब जाएँ तो, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, भगतसिंह की माताजी और बटुकेश्वर दत्त की समाधि के स्थान पर अवश्य जाएँ |

यही तो कालखंड था, जब आज़ादी की ललक, उसकी तीव्रता, उसका व्याप बढ़ता ही चला जा रहा था | एक तरफ़ भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे वीरों ने सशस्त्र क्रांति के लिये युवकों को प्रेरणा दी थी | तो आज से ठीक सौ साल पहले - 10 अप्रैल, 1917 - महात्मा गाँधी ने चंपारण सत्याग्रह किया था | यह चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी का वर्ष है | भारत की आज़ादी के आन्दोलन में, गाँधी विचार और गाँधी शैली, इसका प्रकट रूप पहली बार चंपारण में नज़र आया | आज़ादी की पूरी आंदोलन यात्रा में यह एक turning point था, ख़ास करके, संघर्ष के तौर-तरीक़े की दृष्टि से | यही वो कालखंड था, चंपारण का सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह, अहमदाबाद में मिल-मज़दूरों की हड़ताल, और इन सबमें महात्मा गाँधी की विचार और कार्यशैली का गहरा प्रभाव नज़र आता था | 1915 में गाँधी विदेश से वापस आए और 1917 में बिहार के एक छोटे से गाँव में जाकर के उन्होंने देश को नई प्रेरणा दी | आज हमारे मन में महात्मा गाँधी की जो छवि है, उस छवि के आधार पर हम चंपारण सत्याग्रह का मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं | कल्पना कीजिए कि एक इंसान, जो 1915 में हिन्दुस्तान वापस आए, सिर्फ़ दो साल का कार्यकाल | न देश उनको जानता था, न उनका प्रभाव था, अभी तो शुरुआत थी | उस समय उनको कितना कष्ट झेलना पडा होगा, कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी, इसका हम अंदाज़ कर सकते हैं | और चंपारण सत्याग्रह ऐसा था कि जिसमें महात्मा गाँधी के संगठन कौशल, महात्मा गाँधी की भारतीय समाज की नब्ज़ को जानने की शक्ति, महात्मा गाँधी अपने व्यवहार से अंग्रेज सल्तनत के सामने ग़रीब से ग़रीब, अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति को संघर्ष के लिये संगठित करना, प्रेरित करना, संघर्ष के लिये मैदान में लाना, ये अद्भुत शक्ति के दर्शन कराता है | और इसलिये जिस रूप में हम महात्मा गाँधी की विराटता को अनुभव करते हैं | लेकिन अगर सौ साल पहले के गाँधी को सोचें, उस चंपारण सत्याग्रह वाले गाँधी को, तो सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए चंपारण सत्याग्रह एक बहुत ही अध्ययन का विषय है | सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कैसे की जा सकती है, ख़ुद कितना परिश्रम करना होता है और गाँधी ने कैसे किया था, यह हम उनसे सीख सकते हैं | और वो समय था, जितने बड़े-बड़े दिग्गज नेताओं के हम नाम सुनते हैं, गाँधी ने उस समय राजेंद्र बाबू हों, आचार्य कृपलानी जी हों, सबको गाँवों में भेजा था | लोगों के साथ जुड़ करके, लोग जो काम कर रहे हैं, उसी को आज़ादी के रंग से रंग देना - इसके तरीक़े सिखाए थे | और अंग्रेज़ लोग समझ ही नहीं पाए कि ये गाँधी का तौर-तरीका क्या है | संघर्ष भी चले, सृजन भी चले और दोनों एक साथ चले | गाँधी ने जैसे एक सिक्के के दो पहलू बना दिए थे, एक सिक्के का एक पहलू संघर्ष, तो दूसरा पहलू सृजन | एक तरफ़ जेल भर देना, तो दूसरी तरफ़ रचनात्मक कार्यों में अपने आप को खपा देना | एक बड़ा अद्भुत balance गाँधी की कार्य-शैली में था | सत्याग्रह शब्द क्या होता है, असहमति क्या हो सकती है, इतनी बड़ी सल्तनत के सामने असहयोग क्या होता है - एक पूरी नई विभावना गाँधी ने शब्दों के द्वारा नहीं, एक सफल प्रयोग के द्वारा प्रस्थापित कर दी थी |

आज जब देश चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी मना रहा है, तब भारत के सामान्य मानव की शक्ति कितनी अपार है, उस अपार शक्ति को आज़ादी के आन्दोलन की तरह, स्वराज से सुराज की यात्रा भी, सवा-सौ करोड़ देशवासियों की संकल्प शक्ति, परिश्रम की पराकाष्ठा, ‘सर्वजन हिताय – सर्वजन सुखाय’ इस मूल मन्त्र को ले करके, देश के लिये, समाज के लिये, कुछ कर-गुज़रने का अखंड प्रयास ही आज़ादी के लिये मर-मिटने वाले उन महापुरुषों के सपनों को साकार करेगा |

आज जब हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, तब कौन हिन्दुस्तानी ऐसा होगा, जो भारत को बदलना नहीं चाहता होगा, कौन हिन्दुस्तानी होगा, जो देश में बदलाव के लिये हिस्सेदार बनना नहीं चाहता हो | सवा-सौ करोड़ देशवासियों की ये बदलाव की चाह, ये बदलाव का प्रयास, यही तो है, जो नये भारत, New India, इसकी मज़बूत नींव डालेगा | New India न तो कोई सरकारी कार्यक्रम है, न ही किसी राजनैतिक दल का manifesto है और न ही ये कोई project है | New India सवा-सौ करोड़ देशवासियों का आह्वान है | यही भाव है कि सवा-सौ करोड़ देशवासी मिलकर के कैसा भव्य भारत बनाना चाहते हैं | सवा-सौ करोड़ देशवासियों के मन के अन्दर एक आशा है, एक उमंग है, एक संकल्प है, एक चाह है |

मेरे प्यारे देशवासियो, अगर हम थोड़ा सा अपनी निजी ज़िन्दगी से हट करके संवेदना-सभर (संवेदना से भरी) नज़र से समाज में चल रही गतिविधियों को देखेंगें, हमारे अगल-बगल में क्या हो रहा है, उसको जानने-समझने का प्रयास करेंगे, तो हम हैरान हो जाएँगे कि लक्षावधि लोग निस्वार्थ भाव से अपनी निजी ज़िम्मेवारियों के अतिरिक्त समाज के लिये, शोषित-पीड़ित-वंचितों के लिये, ग़रीबों के लिये, दुखियारों के लिये कुछ-न-कुछ करते हुए नज़र आते हैं | और वे भी एक मूक सेवक की तरह जैसे तपस्या करते हों, साधना करते हों, वो करते रहते हैं | कई लोग होते हैं, जो नित्य अस्पताल जाते हैं, मरीज़ों की मदद करते हैं | अनेक लोग होते हैं, पता चलते ही रक्तदान के लिए दौड़ जाते हैं | अनेक लोग होते हैं, कोई भूखा है, तो उसके भोजन की चिंता करते हैं | हमारा देश बहुरत्ना वसुन्धरा है | जन-सेवा ही प्रभु-सेवा, यह हमारी रगों में है | अगर एक बार हम उसको सामूहिकता के रूप में देखें, संगठित रूप में देखें, तो ये कितनी बड़ी शक्ति है |  जब New India की बात होती है, तो उसकी आलोचना होना, विवेचना होना, भिन्न नज़रिये से उसे देखना, ये बहुत स्वाभाविक है और ये लोकतंत्र में अवकार्य है | लेकिन ये बात सही है कि सवा-सौ करोड़ देशवासी अगर संकल्प करें, संकल्प को सिद्ध करने के लिये राह तय कर लें, एक-के-बाद-एक क़दम उठाते चलें, तो New India सवा-सौ करोड़ देशवासियों का सपना हमारी आँखों के सामने सिद्ध हो सकता है | और ज़रूरी नहीं है कि ये सब चीज़ें बजट से होती हैं, सरकारी project से होती हैं, सरकारी धन से होती हैं | अगर हर नागरिक संकल्प करे कि मैं traffic के नियमों का पालन करूँ, अगर हर नागरिक संकल्प करे कि मैं मेरी ज़िम्मेवारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाऊँगा, अगर हर नागरिक संकल्प करे कि सप्ताह में एक दिन मैं petrol-diesel का उपयोग नहीं करूँगा अपने जीवन में | चीज़ें छोटी-छोटी होती हैं | आप देखिए इस देश को, जो New India का सपना सवा-सौ करोड़ देशवासी देख रहे हैं, वो अपनी आँखों के सामने साकार होता देख पाएँगे | कहने का तात्पर्य यही है कि हर नागरिक अपने नागरिक धर्म का पालन करे, कर्तव्य का पालन करे | यही अपने आप में New India की एक अच्छी शुरुआत बन सकता है |

आइए, 2022 - भारत की आज़ादी के 75 साल होने जा रहे हैं | भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को याद करते हैं, चंपारण के सत्याग्रह को याद करते हैं | तो क्यों न हम भी ‘स्वराज से सुराज’ की इस यात्रा में अपने जीवन को अनुशासित करके, संकल्पबद्ध करके क्यों न जोड़ें | मैं आपको निमंत्रण देता हूँ – आइए |

मेरे प्यारे देशवासियो, मैं आज आपका आभार भी व्यक्त करना चाहता हूँ | पिछले कुछ महीनों में हमारे देश में एक ऐसा माहौल बना, बहुत बड़ी मात्रा में लोग digital payment डिजिधन आंदोलन में शरीक़   हुए | बिना नक़द कैसे लेन-देन की जा सकती है, उसकी जिज्ञासा भी बढ़ी है, ग़रीब से ग़रीब भी सीखने का प्रयास कर रहा है और धीरे-धीरे लोग भी बिना नक़द कारोबार कैसे करना, उसकी ओर आगे बढ़ रहे हैं | demonetisation नोटबंदी के बाद से digital payment के अलग-अलग तरीक़ों में काफ़ी वृद्धि देखने को मिली है | BHIM-App इसको प्रारंभ किए हुए अभी दो-ढाई महीने का ही समय हुआ है, लेकिन अब तक क़रीब-क़रीब डेढ़ करोड़ लोगों ने इसे download किया है |

मेरे प्यारे देशवासियो, काले धन, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई को हमें आगे बढ़ाना है | सवा-सौ करोड़ देशवासी इस एक वर्ष में ढाई हज़ार करोड़ digital लेन-देन का काम करने का संकल्प कर सकते हैं क्या? हमने बजट में घोषणा की है | सवा-सौ करोड़ देशवासियों के लिये ये काम अगर वो चाहें, तो एक साल का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं, छः महीने में कर सकते हैं | ढाई हज़ार करोड़ digital transaction, अगर हम स्कूल में fee भरेंगे तो cash से नहीं भरेंगे, digital से भरेंगे, हम रेलवे में प्रवास करेंगे, विमान में प्रवास करेंगे, digital से payment करेंगे, हम दवाई ख़रीदेंगे, digital payment करेंगे, हम सस्ते अनाज की दुकान चलाते हैं, हम digital व्यवस्था से करेंगे | रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में ये कर सकते हैं हम | आपको कल्पना नहीं है, लेकिन इससे आप देश की बहुत बड़ी सेवा कर सकते हैं और काले धन, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के आप एक वीर सैनिक बन सकते हैं | पिछले दिनों लोक-शिक्षा के लिये, लोक-जागृति के लिये डिजिधन मेला के कई कार्यक्रम हुए हैं | देश भर में 100 कार्यक्रम करने का संकल्प है | 80-85 कार्यक्रम हो चुके हैं | उसमें इनाम योजना भी थी | क़रीब साढ़े बारह लाख लोगों ने उपभोक्ता वाला ये इनाम प्राप्त किया है | 70 हज़ार लोगों ने व्यापारियों के लिये जो इनाम था, वो प्राप्त हुआ है | और हर किसी ने इस काम को आगे बढ़ाने का संकल्प भी किया है | 14 अप्रैल डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्म-जयंती है | और बहुत पहले से जैसे तय हुआ था, 14 अप्रैल को बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्म-जयंती पर इस डिजि-मेला का समापन होने वाला है | सौ दिन पूरे हो करके एक आख़िरी बहुत बड़ा कार्यक्रम होने वाला है | बहुत बड़े draw का भी उसमें प्रावधान है | मुझे विश्वास है कि बाबा साहेब अम्बेडकर की जन्म-जयंती का जितना भी समय अभी हमारे पास बचा है, BHIM-App का हम प्रचार करें | नक़द कम कैसे हो, नोटों का व्यवहार कम कैसे हो, उसमें हम अपना योगदान दें |

मेरे प्यारे देशवासियो, मुझे ख़ुशी है कि मुझे हर बार, जब भी ‘मन की बात’ के लिये लोगों से सुझाव माँगता हूँ, अनेक-अनेक प्रकार के सुझाव आते हैं | लेकिन ये मैंने देखा है कि स्वच्छता के विषय में हर बार आग्रह रहता ही रहता है |

मुझे देहरादून से गायत्री नाम की एक बिटिया ने, जो कि 11वीं की छात्रा है, उसने फ़ोन करके एक message भेजा है: -

“आदरणीय प्रधानाचार्य, प्रधानमंत्री जी, आपको मेरा सादर प्रणाम | सबसे पहले तो आपको बहुत बधाइयाँ कि आप इस चुनाव में आपने भारी मतों से विजय हासिल की है |  मैं आपसे अपने मन की बात करना चाहती हूँ | मैं कहना चाहती हूँ कि लोगों को यह समझाना होगा कि स्वच्छता कितनी ज़रूरी है | मैं रोज़ उस नदी से हो कर जाती हूँ, जिसमें लोग बहुत सा कूड़ा-करकट भी डालते हैं और नदियों को दूषित करते हैं | वह नदी रिस्पना पुल से होते हुए आती है और मेरे घर तक भी आती है | इस नदी के लिये हमने बस्तियों में जा करके हमने रैली भी निकाली और लोगों से बातचीत भी की, परन्तु उसका कुछ फ़ायदा न हुआ | मैं आपसे ये कहना चाहती हूँ कि अपनी एक टीम भेजकर या फिर न्यूज़पेपर के माध्यम से इस बात को उजागर किया जाए, धन्यवाद |”

देखिए भाइयो-बहनो, 11वीं कक्षा की एक बेटी की कितनी पीड़ा है | उस नदी में कूड़ा-कचरा देख कर के उसको कितना गुस्सा आ रहा है | मैं इसे अच्छी निशानी मानता हूँ | मैं यही तो चाहता हूँ, सवा-सौ करोड़ देशवासियों के मन में गन्दगी के प्रति गुस्सा पैदा हो | एक बार गुस्सा पैदा होगा, नाराज़गी पैदा होगी, उसके प्रति रोष पैदा होगा, हम ही गन्दगी के खिलाफ़ कुछ-न-कुछ करने लग जाएँगे | और अच्छी बात है कि गायत्री स्वयं अपना गुस्सा भी प्रकट कर रही है, मुझे सुझाव भी दे रही है, लेकिन साथ-साथ ख़ुद ये भी कह रही है कि उसने काफ़ी प्रयास किए, लेकिन विफलता मिली | जब से स्वच्छता के आन्दोलन की शुरुआत हुई है, जागरूकता आई है | हर कोई उसमें सकारात्मक रूप से जुड़ता चला गया है | उसने एक आंदोलन का रूप भी लिया है | गन्दगी के प्रति नफ़रत भी बढ़ती चली जा रही है | जागरूकता हो, सक्रिय भागीदारी हो, आंदोलन हो, इसका अपना महत्व है ही है | लेकिन स्वच्छता आंदोलन से ज़्यादा आदत से जुड़ी हुई होती है | ये आंदोलन आदत बदलने का आंदोलन है, ये आंदोलन स्वच्छता की आदत पैदा करने का आंदोलन है, आंदोलन सामूहिक रूप से हो सकता है | काम कठिन है, लेकिन करना है I मुझे विश्वास है कि देश की नयी पीढ़ी में, बालकों में, विद्यार्थियों में, युवकों में, ये जो भाव जगा है, ये अपने-आप में अच्छे परिणाम के संकेत देता है I आज की मेरी ‘मन की बात’ में गायत्री की बात जो भी सुन रहे हैं, मैं सारे देशवासियों को कहूँगा कि गायत्री का संदेश हम सब के लिये संदेश बनना चाहिए I

मेरे प्यारे देशवासियो, जब से मैं ‘मन की बात’ कार्यक्रम को कर रहा हूँ, प्रारंभ से ही एक बात पर कई सुझाव मुझे मिलते रहे हैं और वो ज़्यादातर लोगों ने चिंता जताई है food wastage के संबंध में I हम जानते हैं कि हम परिवार में भी और सामूहिक भोजन समारोह में भी ज़रूरत से ज़्यादा plate में ले लेते हैं I जितनी चीज़ें दिखाई दे, सब सारी की सारी plate में भर देते हैं और फिर खा नहीं पाते हैं I जितना plate में भरते हैं, उससे आधा भी पेट में नहीं भरते हैं और फिर वहीं छोड़ कर निकल जाते हैं I आपने कभी सोचा है कि हम जो ये जूठन छोड़ देते हैं, उससे हम कितनी बर्बादी करते हैं I क्या कभी सोचा है कि अगर जूठन न छोड़ें, तो ये कितने ग़रीबों का पेट भर सकता है I ये विषय ऐसा नहीं है कि जो समझाना पड़े I वैसे हमारे परिवार में छोटे बालकों को जब माँ परोसती है, तो कहती है कि बेटा, जितना खा सकते हो, उतना ही लो I कुछ-न-कुछ तो प्रयास होता रहता है, लेकिन फिर भी इस विषय पर उदासीनता एक समाजद्रोह है I ग़रीबों के साथ अन्याय है I दूसरा, अगर बचत होगी, तो परिवार का भी तो आर्थिक लाभ है I समाज के लिये  सोचें, अच्छी बात है, लेकिन ये विषय ऐसा है कि परिवार का भी लाभ है I मैं इस विषय पर ज़्यादा आग्रह नहीं कर रहा हूँ, लेकिन मैं चाहूँगा कि ये जागरूकता बढ़नी चाहिए I मैं कुछ युवकों को तो जानता हूँ कि जो इस प्रकार के आंदोलन चलाते हैं, उन्होंने Mobile App बनाए हैं और कहीं पर भी इस प्रकार की जूठन पड़ी है, तो लोग बुलाते हैं, वो लोग सब इकठ्ठा करते हैं और इसका सदुपयोग करते हैं, मेहनत करते हैं और हमारे ही देश के नौजवान ही करते हैं I हिंदुस्तान के हर राज्य में कहीं-न-कहीं आपको ऐसे लोग मिलेंगे I उनका जीवन भी हम लोगों को प्रेरणा दे सकता है कि हम जूठन न करें I हम उतना ही लें, जितना खाना है I  

देखिए, बदलाव के लिये यही तो रास्ते होते हैं I और जो लोग शरीर स्वास्थ्य के संबंध में जागरूक होते हैं, वो तो हमेशा कहते हैं - पेट भी थोड़ा ख़ाली रखो, प्लेट भी थोड़ी ख़ाली रखो I और जब स्वास्थ्य की बात आई है, तो 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस है, World Health Day I संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक Universal Health Coverage यानि कि सबको स्वास्थ्य का लक्ष्य तय किया है I इस बार United Nations ने 7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दिवस पर Depression विषय पर focus किया है I Depression ये इस बार की उनकी theme है I हम लोग भी Depression शब्द से परिचित हैं, लेकिन अगर शाब्दिक अर्थ करना है, तो कुछ लोग उसको अवसाद भी कहते हैं I एक अनुमान है कि दुनिया के अन्दर 35 करोड़ से ज़्यादा लोग मानसिक रूप से, Depression से पीड़ित हैं I मुसीबत ये है कि हमारे अगल-बगल में भी इस बात को हम समझ नहीं पाते हैं और शायद इस विषय में खुल कर के बात करने में हम संकोच भी करते हैं I जो स्वयं Depression महसूस करता है, वो भी कुछ बोलता नहीं, क्योंकि वो थोड़ी शर्मिंदगी महसूस करता है I

मैं देशवासियों से कहना चाहूँगा कि Depression ऐसा नहीं है कि उससे मुक्ति नहीं मिल सकती है I एक मनोवैज्ञानिक माहौल पैदा करना होता है और उसकी शुरुआत होती है I पहला मंत्र है, Depression के suppression की बजाय इसके expression की ज़रूरत है I अपने साथियों के बीच, मित्रों के बीच, माँ-बाप के बीच, भाइयों के बीच, teacher के साथ, खुल कर के कहिए आपको क्या हो रहा है ! कभी-कभी अकेलापन ख़ास कर के hostel में रहने वाले बच्चों को तकलीफ़ ज़्यादा हो जाती है I हमारे देश का सौभाग्य रहा कि हम लोग संयुक्त परिवार में पले-बढ़े हैं, विशाल परिवार होता है, मेल-जोल रहता है और उसके कारण Depression की संभावनायें ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन फिर भी मैं माँ-बाप को कहना चाहूँगा कि आपने कभी देखा है कि आपका बेटा या बेटी या परिवार का कोई भी सदस्य - पहले जब आप खाना खाते थे, सब लोग साथ खाते थे, लेकिन एक परिवार का व्यक्ति - वो कहता है - नहीं, मैं बाद में खाऊंगा - वो table पर नहीं आता है I घर में सब लोग कहीं बाहर जा रहे हैं, तो कहता है - नहीं-नहीं, मुझे आज नहीं आना है - अकेला रहना पसंद करता है I आपका कभी ध्यान गया है कि ऐसा क्यों करता है ? आप ज़रूर मानिए कि वो Depression की दिशा का पहला क़दम है I अगर वो आप से समूह में रहना पसंद नहीं करता है, अकेला एक कोने में चला जा रहा है, तो प्रयत्नपूर्वक देखिए कि ऐसा न होने दें I उसके साथ खुल कर के जो बात करते हैं, ऐसे लोगों के साथ उसको बीच में रहने का अवसर दीजिए I हँसी-ख़ुशी की खुल कर के बातें करते-करते-करते उसको expression के लिये प्रेरित करें, उसके अन्दर कौन-सी कुंठा कहाँ पड़ी है, उसको बाहर निकालिए I ये उत्तम उपाय है | और Depression मानसिक और शारीरिक बीमारियों का कारण बन जाता है | जैसे Diabetes हर प्रकार की बीमारियों का यजमान बन जाता है, वैसे Depression भी टिकने की, लड़ने की, साहस करने की, निर्णय करने की, हमारी सारी क्षमताओं को ध्वस्त कर देता है I आपके मित्र, आपका परिवार, आपका परिसर, आपका माहौल - ये मिलकर के ही आपको Depression में जाने से रोक भी सकते हैं और गए हैं, तो बाहर ला सकते हैं I एक और भी तरीक़ा है I अगर अपनों के बीच में आप खुल करके अपने expression नहीं कर पाते हों, तो एक काम कीजिए, अगल-बगल में कही सेवा-भाव से लोगों की मदद करने चले जाइए I मन लगा के मदद कीजिए, उनके सुख-दुःख को बाँटिए, आप देखना, आपके भीतर का दर्द यूँ ही मिटता चला जाएगा I उनके दुखों को अगर आप समझने की कोशिश करोगे, सेवा-भाव से करोगे, आपके अन्दर एक नया आत्मविश्वास पैदा होगा I औरों से जुड़ने से, किसी की सेवा करने से, और निःस्वार्थ भाव से अगर सेवा करते हैं, तो आप अपने मन के बोझ को बहुत आसानी से हल्का कर सकते हैं I

वैसे योग भी अपने मन को स्वस्थ रखने के लिये एक अच्छा मार्ग है I तनाव से मुक्ति, दबाव से मुक्ति, प्रसन्न चित्त की ओर प्रयाण - योग बहुत मदद करता है I 21 जून अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस है I ये तीसरा वर्ष होगा I आप भी अभी से तैयारी कीजिए और लाखों की तादाद में सामूहिक योग उत्सव मनाना चाहिए I आपके मन में तीसरे अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के संबंध में अगर कोई सुझाव है, तो आप मेरे mobile application के माध्यम से अपने सुझाव मुझे ज़रूर भेजें, मार्गदर्शन करें | योग के संबंध में जितने गीत, काव्यमय रचनायें आप तैयार कर सकते हैं, वो करनी चाहिए, ताकि वो सहज रूप से लोगों को समझ आ जाता है I

माताओं और बहनों से भी मैं ज़रूर आज एक बात करना चाहूँगा, क्योंकि आज health की ही चर्चा काफ़ी निकली है, स्वास्थ्य की बातें काफ़ी हुई हैं I तो पिछले दिनों भारत सरकार ने एक बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय किया है I हमारे देश में जो working class women हैं, कामकाजी वर्ग में जो हमारी महिलायें हैं और दिनों-दिन उनकी संख्या भी बढ़ रही है, उनकी भागीदारी बढ़ रही है और ये स्वागत योग्य है, लेकिन साथ-साथ, महिलाओं के पास विशेष ज़िम्मेवारियाँ भी हैं | परिवार की ज़िम्मेवारियाँ वो संभालती हैं, घर की आर्थिक ज़िम्मेवारियाँ भी उसकी भागीदारी भी उसको करनी पड़ती है और उसके कारण कभी-कभी नवजात शिशु के साथ अन्याय हो जाता है I भारत सरकार ने एक बहुत बड़ा फ़ैसला किया है I ये जो कामकाजी वर्ग की महिलायें हैं, उनको प्रसूति के समय, pregnancy के समय, delivery के समय, maternity leave जो पहले 12 सप्ताह मिलती थी, अब 26 सप्ताह दी जाएगी I दुनिया में शायद दो या तीन ही देश हैं, जो हम से आगे हैं I भारत ने एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण फ़ैसला हमारी इन बहनों के लिये किया है I और उसका मूल उद्देश्य उस नवजात शिशु की देखभाल, भारत का भावी नागरिक, जन्म के प्रारम्भिक काल में उसकी सही देखभाल हो, माँ का उसको भरपूर प्यार मिले, तो हमारे ये बालक बड़े हो करके देश की अमानत बनेंगे | माताओं का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा और इसलिये ये बहुत बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय है I और इसके कारण formal sector में काम करने वाली क़रीब 18 लाख महिलाओं को इसका फ़ायदा मिलेगा I

मेरे प्यारे देशवासियो, 5 अप्रैल को रामनवमी का पावन पर्व है, 9 अप्रैल को महावीर जयंती है, 14 अप्रैल को बाबा साहब अम्बेडकर की जन्म-जयंती है I ये सभी महापुरुषों का जीवन हमें प्रेरणा देता रहे, New India के लिये संकल्प करने की ताक़त दे |   दो दिन के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वर्ष प्रतिपदा, नव संवत्सर, इस नववर्ष के लिये आपको बहुत-बहुत शुभकामनायें I वसन्त ऋतु के बाद फ़सल पकने के प्रारंभ और किसानों को उनकी मेहनत का फल मिलने का ये ही समय है I हमारे देश के अलग-अलग कोने में इस नववर्ष को अलग-अलग रूप में मनाया जाता है I महाराष्ट्र में गुड़ी-पड़वा, आंध्र-कर्नाटक में नववर्ष के तौर पर उगादी, सिन्धी चेटी-चांद, कश्मीरी नवरेह, अवध के क्षेत्र में संवत्सर पूजा, बिहार के मिथिला में जुड़-शीतल और मगध में सतुवानी का त्योहार नववर्ष पर होता है I अनगिनत, भारत इतनी विविधताओं से भरा हुआ देश है I आपको भी इस नववर्ष की मेरी तरफ़ से बहुत-बहुत शुभकामनायें I बहुत-बहुत धन्यवाद I


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Monday, 20 February 2017

World Day of Social Justice: Global Mission to promote human dignity and co-existence


The day we will stop discrimination of any kind, based on gender, age, race, ethnicity, religion, culture or disability, that day we will be considered as humans in real sense.
In order to promote this peaceful co-existence, World Day of Social Justice is observed every year on 20th Feb every year.


Social justice is a basic rule for peaceful and prosperous concurrence inside and among countries
The United Nations uphold the principles of social justice where they promote gender equality or the rights of indigenous people and migrants. They advance social justice by removing barriers people face because of gender, age, race, ethnicity, religion, culture or disability.

The aspect of social justice lies in their global mission to promote development and human dignity. The adoption by the International Labor Organization of the Declaration on Social Justice for a Fair Globalization is just one recent example of the UN system’s commitment to social justice.
The Declaration focuses on guaranteeing fair outcomes for all through employment, social protection, social dialogue, and fundamental principles and rights at work.

The General Assembly proclaimed 20 February as World Day of Social Justice in 2007, inviting Member States to devote the day to promoting national activities in accordance with the objectives and goals of the World Summit for Social Development and the twenty-fourth session of the General Assembly. Observance of World Day of Social Justice should support efforts of the international community in poverty eradication, the promotion of full employment and decent work, gender equity and access to social well-being and justice for all.


This World Day of Social Justice, lets promote peaceful co-existence, harmony and strive for a better world making it a better place to live in for each one of us. 

Payal Choudhary

Thursday, 16 February 2017

Raja Harishchandra to Dangal : the changing face of Indian Cinema



There is no denying the fact that the two things that surpass regional and continental barriers for Indians across the world are; Indian Food and Indian Cinema or as commonly called “Bollywood”. While Indian food reminds you of “maa ke haath ka khaana”, Indian cinema acts as a temporary relief from stresses of life and tries to bring in a little bit of entertainment in our otherwise mundane(or so we think) lives.  
In over 100 years since its inception the Indian Film Industry has grown exponentially, not only in economic and monetary terms but also the varied subjects and “out of the box” ideas that are now showcased on the big screen.  
The first feature film made in India by the “Father on Indian Cinema” Dadasaheb Phalke was titled “Raja Harishchandra” which released on May 3, 1913. Albeit being a silent film, it made a loud noise! It paved the way for a Multi-billion-dollar industry, one that would go on to break taboos, represent Indian society and place India on a global platform.



Early Days
In the beginning, Indian cinema focussed on Mythological stories and the great Epics. This period also saw movies dealing with India’s struggle for Freedom and aimed at instilling in the audience a sense of patriotism. In the period after India’s independence, Indian cinema acted as vehicle for addressing social ills prevalent in Indian society.  

Golden Era
The “Golden Era of Indian Cinema” as the years from the early 1940’s to late 1960’s is called, saw movies which represented common man and the struggles he faced. This phase focussed more on high morals and the importance of being a morally correct person. The burning issue of poverty was also addressed in the movies of this age. The Protagonist always essayed roles that would resonate with the audience’s life in some way.  The films in this period also focussed on relationships, customs, norms and ethics on Indian society.
‘Kaagaz ke Phool’, ‘Mother India’, ‘Pakeezah’, ‘Padosan’ are a few of the movies that were a resounding success in this “Golden Era”

Action Era
The late 1960’s to the early 1980’s is also known as the Action Era. This phase witnessed a distinctive shift in the movie storyline. Movies at this time were more action based and had a tinge of romance. Violence was an integral [art of the movie with a major emphasis on “Villains”. The notion of ‘Angry Young Man’ was introduced during this period. A lot of films during this time revolved around the basic story line of a hero who was very good at delivering his punches and kicks, would destroy the villain and win the lady’s heart in the end.

Movies like ‘Aradhana’, ‘Anand’, ‘Bobby’ and ‘Sholay’ were released during this period.


Globalization and the present times
The phase from the late 1980’s till now has witnessed the most diverse shift in movie-making.  The direction, representation of women, the varied issues addressed in movies has witnessed a tectonic shift.
Movies like ‘Rang De Basanti’, ‘3 idiots’, ‘Taare Zameen Par’, ‘Nil Battey Sannata’, ‘Pink’ and ‘Dangal’ have shifted the focus from the run off the mill romance, with people running around trees to one that has forced the audience to think and implement changes in their own lifestyle.
Movies of these times also put India on the global platform, with actors, directors, musicians all competing for international awards, like the Oscars, BAFTA’s and the GRAMMY’s.

 As the great filmmaker Satyajit Ray said, “Cinema’s characteristic forte is its ability to capture and communicate the intimacies of the human mind.” This changing characteristic of Indian cinema is one that is being widely accepted and welcomed. The changing patterns in movies are also a result of the changing mind set of the audience.

As Bollywood continues to unite people across continents let us hope this trend of movies that compel us to think, act and implement continue.