Monday, 11 June 2012

डॉ. जगदीश चंद्र माथुर स्मृति व्याख्यान 2011

 डॉ. जगदीश चंद्र माथुर स्मृति व्याख्यान 23 दिसम्बर, 2011में श्रोताओं को संबोधित करते दूरदर्शन महानिदेशक श्री त्रिपुरारीशरण

आकाशवाणी महानिदेशालय द्वारा 23 दिसम्बर, 2011 को डॉ.जगदीश चंद्र माथुर स्मृति व्याख्यान का आयोजन आकाशवाणी दिल्ली के प्रसारण भवन में किया गया। सर्वप्रथम श्री लीलाधर मंडलोई महानिदेशक, आकाशवाणी ने जगदीश चंद्र माथुर जी के परिवार से आए हुए उनके दामाद श्री अशोक लाल एवं उनकी पुत्रवधु का स्वागत किया तथा स्व.जगदीश चंद्र माथुर जी की तस्वीर पर पुष्प अर्पित किए। इसके उपरांत पारिवारिक सदस्यों ने कुछ रोचक संस्मरण सुनाये जिससे उनके पारिवारिक व्यक्तित्व की झलक ताज़ा हो गई। 
     16 जुलाई, 1917 को बुलंदशहर, उ.प्र. में जन्मे जगदीश चंद्र माथुर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की। 1941 में आई.सी.एस.की परीक्षा उत्तीर्ण कर आप अमेरिका में प्रशिक्षण प्राप्त करने चले गए। स्कूल/कॉलेज के समय से ही नाटक लिखने और निर्देशन में उनकी रूचि थी। 1954 में वे आकाशवाणी के महानिदेशक बने। महानिदेशक के रूप में अनेक कलाकारों एवं साहित्यकारों को आकाशवाणी से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 
     इनकी प्रसिद्ध नाट्य कृतियों में कोणार्क’, ‘दशरथनंदन’, ‘शारदीया’, ‘पहला राजाअत्यंत चर्चित एवं प्रसिद्ध रहे हैं।  कई सम्मानों से आपको अलंकृत किया गया। सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय में आप संयुक्त सचिव भी रहे। इनका निधन 14 मई, 1978 को हुआ। श्री माथुर जी की स्मृति में आयोजित व्याख्यान के वक्ता श्री त्रिपुरारिशरण जी, महानिदेशक दूरदर्शन ने निश्चित रूप से सर्वसम्मति से रेडियो टेलीविजन और फिल्म के संदर्भ में भाषा के मानकीकरण को निर्धारित करते हुए जनभाषा को मीडिया की भाषा स्वीकार किया। उन्होंने माना कि रेडियो और टेलीविजन की भाषा परिष्कृत एवं सुसंस्कृत हिन्दी ही हो सकती है, जिसमें अभिव्यक्त की गई सरल एवं सुबोध बातें अनेक वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अनेक प्रसारण केन्द्रों का आधार रही हैं। 
      अपने अध्यक्षीय संबोधन में सुप्रसिद्ध कवि लेखक एवं कथाकार डॉ.गंगाप्रसाद विमल ने मीडिया की भाषा, जनभाषा को माना और इसे समाज और संस्कृति से प्रभावित मानते हुए आम भाषा में बोली जाने वाली सरल हिन्दी को मीडिया की भाषा स्वीकार किया।

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